नेहिल-नीर बिन्दु
छलके जब नेहिल-बिन्दु नीर
गीतों की अधजल गगरी से
पलकों की कोरी कोरों से
भींगे भींगे से स्वप्नों का, अधिभार लिये आना!
फिर लौट नहीं जाना!
बदली के कोमल आँचल में
टिम-टिम करते तारक जब
लुक-छिप नटखट ठहरे जब
अवगुंठन हो जाने का, स्वीकार लिये आना!
फिर छूट नहीं जाना!
चंचल चितवन की हीर कनी
मन की मुँदरी के बीच मढ़े
दो नयन ठिठक कर रहें खड़े
प्रिय! मौन हृदय की मीठी, मनुहार लिये आना!
फिर भूल नहीं जाना!
कोकिल की, शुक की तान ज़ुड़े
बिखरे सौरभ नव कुसुमों की
स्वर लहरी गूँजे शलभों की
किंकिनी-नूपुर की मृदु सी, झंकार लिये आना!
फिर रूठ नहीं जाना!
रामनारायण सोनी
३.२.२५
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