तू अमल - तरल
हो सहज - सरल
उठ गीत सज्ज है नव-विहान
ऊषा का अरुणिम नभ वितान
भर अपनी लय में अंगराग
गा ले सविता के स्वस्ति-गान
बीती तम घन की अमानिशा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
तू झर - झर कर
कर हहर - हहर
स्वर्णिम कलशों से श्रृंग शिखर
जगती का कण-कण रहा निखर
कूजित कलरव कलहंसों का
तू मिला स्वरों में अपना स्वर
प्यासी रजनी की बुझी तृषा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
मुखर - प्रखर
उभर - निखर
शलभों में, कोमल कलिका में
लास्य, हास्य, उल्लास जगा
तू भी अब शब्दों- छन्दों में
मधुस्वर में मीठी तान जगा
धरणी में सौरभ-मान लसा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
रामनारायण सोनी
२५.२.२५
No comments:
Post a Comment