Monday, 24 February 2025

तू अमल - तरल


तू अमल - तरल
हो सहज - सरल
उठ गीत सज्ज है नव-विहान
ऊषा का अरुणिम नभ वितान
भर अपनी लय में अंगराग
गा ले सविता के स्वस्ति-गान
      बीती तम घन की अमानिशा
      ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

तू झर - झर कर
कर हहर - हहर

स्वर्णिम कलशों से श्रृंग शिखर
जगती का कण-कण रहा निखर
कूजित कलरव कलहंसों का
तू मिला स्वरों में अपना स्वर
      प्यासी रजनी की बुझी तृषा
      ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

मुखर - प्रखर
उभर - निखर
शलभों में, कोमल कलिका में
लास्य, हास्य, उल्लास जगा
तू भी अब शब्दों- छन्दों में
मधुस्वर में मीठी तान जगा 
     धरणी में सौरभ-मान लसा
     ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

रामनारायण सोनी
२५.२.२५

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