फिर से सजें हम
प्रार्थना में बस तपन है
श्वाँस में केवल अगन है
गीत क्या तुम देव को, इस तरह छलते रहोगे
क्या अधूरी, अधजली ही आस में जलते रहोगे
पाश में क्यों मोह के हम?
दूध बिगड़ा, क्यों मथें हम
संस्तुति के स्वर पनीले
इन तन्त्रियों के तार ढीले
काँपते वागर्थ से तुम, पथभ्रष्ट ही होते रहोगे
गठरियाँ बेचैनियों की, क्या सदा ढोते रहोगे
तीव्र कुण्ठा से ग्रसें क्यों
प्रबल पंखों से उड़ें हम
मेघ बिन आकाश नीरव
शरद में श्री हीन पल्लव
उसरों में बीज श्रम के, व्यर्थ ही बोते रहोगे
शक्तियाँ तुममें अपरिमित, क्या युँही खोते रहोगे
मरु-मृदा का मान कैसा
तरु-लता से फिर सजें हम
रामनारायण सोनी
१२.२.२५
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