प्राण! तुम जब से गए हो
उपवनों से रूठ कर वह
फिर नहीं मधुमास लौटा
टेसुओं के तप्त उर में
बस अगन का ताप छूटा
अब निरा-पतझार ठहरा
प्राण! तुम जब से गए हो
वेणु से उर की निकलते
बस विरागी स्वर बिचारे
चीर के इस यामिनी के
पड़ गये धूमिल सितारे
हर शिरा में शून्य पसरा
प्राण! तुम जब से गए हो
अनछुई, जागी छुअन क्यों
हो रही बोली अबोली
कुछ पलों की याद से ही
अश्रु ने आँखें भिंगो ली
हर दिशा खुद राह तकती
प्राण! तुम जब से गए हो
रामनारायण सोनी
२३. २ . २५
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