गीत तुम पाती बनो तो !
सीख लो तुम शून्य - पथ में
पवन की गति संग उड़ना
पंख पर मेरे मृदुल से
अश्रु के उपहार धरना
इस पुलक की, अश्रु जल की
स्नेह की पाती बनो तो !
प्रिय - प्रवासी गीत तुम इस
नभ - निलय में खो न जाना
संवरण में लोभ के घन,
पथ - भ्रमित तुम हो न जाना
विकल मन की वेदना की
प्रेय की पाती बनो तो
जिस नगर की वीथियों में
सन्दली सौरभ प्रिया की
खटखटा प्रिय - द्वार को फिर
खोलना पाती जिया की
चिर विरह की इस तपन की
अश्रुमय पाती बनो तो !
रामनारायण सोनी
२०.२ . २५
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