Sunday, 21 April 2024

सपन सलोने बचपन के

सपन सलोने बचपन के

बचपन के सपन सलोने जो
गुड्डे गुड़िया के अपने जो
बैठे बैठे ही उड़ते थे
अनबोलेपन में कुढ़ते थे

खुद को उनमें हम खोते थे
सिरहाने ले कर सोते थे
कुछ मेरे थे, कुछ उसके थे
गुत्थमगुत्था हो सिसके थे

फिर इक दिन ऐसा भी आया
फिर वक्त बहेलिया बन छाया
सपने फँस कर उन जालों में
टूटे बिखरे सब ख्यालों में

थे सपन कपूर के बने हुए 
जाने कब, सब काफूर हुए
वे दिन थे कितने सोने के
थे प्रेम बीज कुछ बोने के

सपनों पर सब कुछ वारा
सपनों की मधुमय रसधारा 
जीता करती वो सदा सदा, 
हर खेल सदा मैं ही हारा

इसकी तो थी आदत मेरी, 
उसकी हर जिद होती पूरी
फिर भी बस मैं तो मैं ही था
इस रिश्ते की महकी कस्तूरी

सब से न्यारी बस वह थी, 
था मुट्ठी में आकाश भरा
मन के शहदी मधुबन में
जब जी चाहा मधुमास झरा

बिना पंख हम उड़ते फिरते
छुटका सा था संसार हमारा
पर जो था, जैसा भी था वह
कितना न्यारा, कितना प्यारा 

हम समझे थे ...
धरती तो एक गोला है
हाथों पर उगा फफोला है
फिर से कहीं मिलेंगे सब
पर बीत न पाई काली शब

हमने चुटकी में वो खोया
जो बचपन भर हमने पोया
ढूँढा मस्तक की लेखा में
टूटे तारों की रेखा में

ना गुड्डा था, ना गुड़िया थी
जो आफत की इक पुड़िया थी
इक दिन भूले भटके में
टूटे दर के उस खटके में

चुन्नी गुड़िया की उलझी पाई 
जो दीदी से थी सिलवाई 
अब केवल वही..
बस केवल वही....
हाँ! केवल वही गवाही है,
हाँ! केवल उसे छुपाई है

यादों की बड़ी तिजोरी में
किस्मत की बरजोरी में।
मेरा सब कुछ तुम ले लो
सपनों से कोई मत खेलो

पर, किस्मत में यही बदा है
अपने काँटो से फूल छिदा है
गुड़िया का काजल रहने दो
उसके कानों में सब कहने दो

वरना वे बोल अबोले ही 
इस मिट्टी संग जल जायेंगे
शायद ये सब जल कर ही
उन रूमानी सपनों में
जा कर फिर मिल जायेंगे।

रब से है यह बड़ी शिकायत 
क्यों फिर ऐसी पड़ी रवायत
जो सपन बने, बने फिर बिखरे
हुण्डी यह तो है वो ही, 
भूले से भी जो ना शिकरे

क्यों रच डाला मधुर मेल?
अगर टूटना!, तय था खेल
जो मिला नहीं, वह खोया ही है
भाग जगा इक पल को, फिर सोया ही है

तुम क्या समझे ? 
क्या यह केवल मेरे ही संग घटा है?
नहीं नहीं! सब ओर बँटा है

तुम! 
तुम!! 
और हाँ, तुम भी!
इसी तरह से कहीं कभी, 
हर सक्ष लुटा है
बिखरा बादल नीले नभ में
फिर से क्या वह कभी जुटा है?

अब ढूँढ सको तो ढूँढो, मुझको मुझमें,
खोया कब से मैं ही मुझमें
सपने और सपनों के मेले
निठुर वक्त ने सदा धकेले

बचे न वे डेरे ना तंबू, 
ना खूँटे और न वे बंबू
तू बंजारन, मैं बंजारा
चल तू जीती, ले मैं हारा
चल तू जीती, ले मैं हारा

रामनारायण सोनी
२२ ४ २४

Friday, 12 April 2024

मिली ही कहाँ?

मिली ही कहाँ ?


आँख में आँख उलझी जहाँ थी वहाँ

सारी बिसरी थी सुधियाँ वहाँ की वहाँ

फिर न लौटे वे पल ही कभी आज तक

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


धड़कनों संग धड़कन धड़कती रही

मन के पावों की पायल खनकती रही

बस वो तुम थी वहाँ, और मैं था वहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


दीप जलता रहा देख कर यूँ हमें

पाँव पल के अचानक वहाँ थे थमे

होंश में होश को, होंश था ना वहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


तब से दिल की न दर की कुण्डी बजी

कोई प्यार की ना ही महफिल सजी

आम पर मंजरी है, वो कोयल कहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


हैं वो लमहे जिगर में अभी जो धरे 

हैं पलकों की कोरों में आँसू भरे 

है सिवा तेरे कोई जँचा ही कहाँ ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


उम्र जाती रही आँख पथरा गई

आस बोझिल हुई, और गहरा गई 

अब पता ही कहाँ, मैं कहाँ ? तुम कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


बरसों बरस बाद फिर तुम मिली

उत्सवी हो गई मन की हर इक गली

आज उतरे जमीं पे हैं दोनों जहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


अनगिनत प्रश्न अन्तर में तैरे मगर

दो जुड़े उन दृगों में वो संवाद गूँजे

ये तन थे यहाँ पर, वे मन थे कहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


रामनारायण सोनी

१२.०४.२४