Wednesday, 12 February 2025

अश्रु का स्वाभिमान


झर गया अश्रु का स्वाभिमान

नयनों की पुतली तैर तैर
रज निगल गई खारा खारा
दो संपुट बीच पला मोती
द्रव दौड़ रहा मारा मारा
     दो पल को चमका दिव्यमान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कठिन क्षितिज की कारा से
मृदु-स्वप्न न बन्दी छूट सके
नियति नटी की पीड़ा को
कुछ पल को भी न भूल सके
     करुणा का हतप्रभ तृप्ति-दान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कोमल कलिका के अन्तस में
मुदमय मधुसंचय पलता है
पर विकास के पल में फिर
उसका लुट जाना खलता है
     फिर भी वह करती सुरभि-दान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कुन्दन की खूब तपी काया 
तुमको सौदर्य नजर आया
कोयल का तो मर्म जला, पर
तुमको केवल स्वर भाया
     टूटा मन करता स्वस्ति-गान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

रामनारायण सोनी
१२.२.२५

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