झर गया अश्रु का स्वाभिमान
नयनों की पुतली तैर तैर
रज निगल गई खारा खारा
दो संपुट बीच पला मोती
द्रव दौड़ रहा मारा मारा
दो पल को चमका दिव्यमान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कठिन क्षितिज की कारा से
मृदु-स्वप्न न बन्दी छूट सके
नियति नटी की पीड़ा को
कुछ पल को भी न भूल सके
करुणा का हतप्रभ तृप्ति-दान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कोमल कलिका के अन्तस में
मुदमय मधुसंचय पलता है
पर विकास के पल में फिर
उसका लुट जाना खलता है
फिर भी वह करती सुरभि-दान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कुन्दन की खूब तपी काया
तुमको सौदर्य नजर आया
कोयल का तो मर्म जला, पर
तुमको केवल स्वर भाया
टूटा मन करता स्वस्ति-गान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
रामनारायण सोनी
१२.२.२५
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