गीत के अनुनाद सुन
हीरकों के नत निमन्त्रण
स्निग्ध स्वर का विस्तरण
मुग्ध - अक्षर
पुलक - मर्मर
ज्योति के आलोक पथ में, गीत के स्पन्द बिखरे
आज अन्तर ने उँडेला, लास्य-मय रस रंग उभरे
रागिनी! तुम भी चलो
विद्रुमों के नवल वल्कल
सुमन सौरभ बहे अविरल
उर्मि - अर्पण
विरल - दर्पण
रागिनी के ध्वनित रथ में, कर्णप्रिय अनुनाद सँवरे
मुदित मन की तन्त्रियों में, नव सुकोमल छ्न्द उतरे
कामिनी! तुम भी सुनो
सद्य अरुणिम रश्मि प्राशन
उर धरा का लोल आनन
गा - प्रभाती
रज - सुनाती
द्रुत विलम्बित प्रगत गत में, भैरवी के गान निखरे
स्वर अलिन्दों के मुखर हो, गीत के मन-प्राण विहरे
स्वामिनी! तुम भी सुनो
रामनारायण सोनी
६.२.२५
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