यह कैसा सुख है
मेरे सूने थे खाली पल
निस्तरंग था ठहरा जल
बिम्ब सलोने सपने सा
उभरा लहरों संग अमल
इक सिहर जगी है इस तन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
अंबुद के इन फाहों में
झाँकी किरणें द्युति-मती
नभ के नील-पटल पर
आरेखित जैसे मदन-रती
शिखि सा मन झूमा नर्तन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
यह देख दृगों में अश्रु भरे
छवि तेरी धूसर धूर हुई
यादों की गठरी खुलते ही
वेदना हृदय में पूर हुई
यह कैसा सुख है क्रन्दन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
रामनारायण सोनी
२६.२.२५
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