Wednesday, 26 February 2025

यह कैसा सुख है

यह कैसा सुख है

मेरे सूने थे खाली पल
निस्तरंग था ठहरा जल
बिम्ब सलोने सपने सा 
उभरा लहरों संग अमल
     इक सिहर जगी है इस तन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

अंबुद के इन फाहों में
झाँकी किरणें द्युति-मती
नभ के नील-पटल पर
आरेखित जैसे मदन-रती
     शिखि सा मन झूमा नर्तन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

यह देख दृगों में अश्रु भरे
छवि तेरी धूसर धूर हुई
यादों की गठरी खुलते ही
वेदना हृदय में पूर हुई
     यह कैसा सुख है क्रन्दन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

            रामनारायण सोनी
              २६.२.२५

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