उदधि अहर्निश बिना थके ही
निज-उर का मंथन करता है
खार-खार का पिये हलाहल
जग में मृदु-जल भरता है
तप कर भी यह सिन्धु हमें क्या
विकल वेदना कह पाता है
पुष्प खिले लघु-जीवन लेकर
बिखर-बिखर माटी में सोये
अपनी मधु के आसव-घट से
कितने ही मधुमास संजोये
लघुता से शापित हो कर भी
निज सर्वस्व लुटा जाता है
ज्वाल वर्तिका अपने माथे
धर कर भी सिंचन करती है
चाहे कितनी जले-तपे फिर
द्रव चुकने पर खुद जलती है
उसका तन-मन, सारा जीवन
फिर से लौट नहीं पाता है
किन्तु मनुज की बगुले सी ही
दृष्टि लोभ की मछली पर है
पहने मोहक मुखर मुखौटे
काजल सा काला अन्तर है
भर कर भारी धन की गठरी
साथ कभी क्या ले जाता है
रामनारायण सोनी
२४.२.२५
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