Thursday, 13 February 2025

शब्दों की प्रतिच्छाया


शब्दों की प्रतिछाया

मसि से अंकित काया में
भावों के रंग संजोता हूँ
नीरव रजनी के तारक से
मैं चुन चुन माल पिरोता हूँ
     सुमनों के सौरभ अर्क लसी
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

प्रिय! और निकट आओ तो
जीवन-मधु-प्राश कराऊँगा
कटुता के कंटक बीन-बीन
मधुरिम पाथेय जिमाऊँगा
     यायावर उँगली थाम चलो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

स्वर-ताल-छन्द की सरिता में
थोड़ा अवगाहन कर देखो
तट के नत हैं तरु-तमाल 
इनमें रस-साल मला देखो
     स्वर-वैभव गौरव गान सुनो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

जीवन के खुलते पृष्ठों में
अनुभव का है अमरकोष
हत आशा है कुछ कहीं कहीं,
कहीं समर का विजय घोष
     इन गीतों का सम्मान करो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

     रामनारायण सोनी
        १४.२.२५


मैं शब्दों की प्रतिछाया

मसि से अंकित काया में
भावों के रंग संजोता हूँ
नीरव रजनी के तारक से
मैं चुन चुन माल पिरोता हूँ
     सुमनों के सौरभ अर्क लसी
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

प्रिय! और निकट आओ तो
जीवन-मधु-प्राश कराऊँगा
कटुता के कंटक बीन-बीन
मधुरिम पाथेय जिमाऊँगा
     यायावर उँगली थाम चलो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

स्वर-ताल-छन्द की सरिता में
थोड़ा अवगाहन कर देखो
तट के नत हैं तरु-तमाल 
इनमें रस-साल मला देखो
     स्वर-वैभव गौरव गान सुनो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

जीवन के खुलते पृष्ठों में
अनुभव का है अमरकोष
हत आशा है कुछ कहीं कहीं,
कहीं समर का विजय घोष
     इन गीतों का सम्मान करो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

     रामनारायण सोनी
        १४.२.२५

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