सृजन के संकल्प
तुम प्रणय के गीत हो या
हो प्रयाणों के प्रलय पल
रुक गये यदि हो विकम्पित
लह न पाये धार अविरल
मृत्यु तुमको ढूँढ लेगी, पाहनों के प्रस्तरों में
शब्द की इस देह में, भाव के घन विह्वरों में
स्वर-सुधा का पान कर लो
गति-साध का आधान कर लो
अग्नि-शर या विपुल बाधा
कंटकित या हो सुमन-पथ
जब साधना की सिद्धि में
कर रहा हो स्वेद लथ-पथ
रत रथी हो या विरथ हो, दुरभि पल में या वरों में
लक्ष्य के संकल्प के थिर, सत्यव्रत हों निज करों में
जयति-जय का गान कर लो
स्वर-नाद का अवधान कर लो
रामनारायण सोनी
७.२.२५
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