Saturday, 15 March 2025

बहारें फिर आएँगी

मन में वसन्त फिर आएँगी

अन्तर के असीम अंचल में
स्मृति के अगणित प्रस्तर में
छवि के अभिलेख लिखे ऐसे
शैलों में तन - चित्र गुदे ऐसे
     क्या अमिट रेख मिट पाएँगी
     क्या काल अग्नि दह पाएँगी

झर जाते तरु के पीत पात
वय - कुठार ने किये घात
कुन्दन कितना ही तपे गले
साँचे में नव - नव रूप ढले
      क्या शाख निरंकुर रह पाएगी
      सह कर भी क्या सह पाएगी?

नभ में कितनी उल्का फैली
धरणी ने आहत हो झेली
पतझार विहरते उपवन में
फिर भी हैं बास सुमन में
      क्या शिशिर सदा रह पाएगी
      मन में वसन्त फिर आएँगी

      रामनारायण सोनी
      १५.३.२५

Sunday, 9 March 2025

मिलन बेला


कलित - करुणा
क्षिप्त - वरुणा
साँझ में पाँखी परों में
गोधुली के रज विरंजित
पलक पुलिनों बीच मुक्ता
अश्रुकन ठहरे विकुण्ठित
     वीण उर की मन्द पड़ती जा रही है
     नीलिमा नभ की सिमटती जा रही है

दस दिशाएँ
पथ भुलाएँ
पंथ भूला मन बटोही
कंटकित सारी दिशाएँ
श्वाँस का हर तन्तु बोझिल
फिर गूँजती घन गर्जनाएँ
      रागिनी की लय बिखरती जा रही है
      लघु यामिनी, कल्प होती जा रही है

तप्त लहरें
धूम्र गहरे
इस अलक्षित ध्येय का
कर रहा मरू में विसर्जन
प्यार के पथ में बिछे
अवरोध का तय है विखंडन
       मिलन बेला पास आती जा  रही है
       यह विरह की रात बीती जा रही है

रामनारायण सोनी
१०.३.२५

Saturday, 8 March 2025

आत्मिका

ऐ गीत मेरे तू गाता चल

गीत क्या है, उसके गुण क्या क्या हैं, लक्षण क्या क्या हैं? उसकी संरचना के और प्रसंस्करण के नियम क्या क्या हैं? ये प्रश्न गीत की बहती सरिता के तटों पर सदैव खड़े रहते हैं।  कदाचित् इन के बीच में अगर ये गीत बह नहीं पाये, कुछ कह नहीं पाये, संयत रह नहीं पाये तो श्रम व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में वे काव्य तो हो सकते हैं पर गीत नहीं। प्रस्तुत कृति में दो गीत ऐसे हैं जो आपको शायद इन प्रश्नों के सूक्ष्म उत्तर खोजते हुए से लगेंगे। 
  मैं समझता हूँ कि गीत की प्रथम प्रस्तुति लोकगीत ही रही होगी जो एक आम आदमी के मन में उपजे भावों की सहज गुनगुनाहट ही रही होगी, जो किसी शास्त्रीय बंधनों को जानती ही नहीं होगी। जैसे ये भँवरे नहीं जानते कि उनके पंखों का स्पन्दन एक संगीतबद्ध संरचना का सहज निर्माण कर देते हैं। पपीहा अपनी मौज में जब स्वाँति नक्षत्र की बूँद मिलने के आनन्द में पिऊ पिऊ बोलता है तो वे स्वर गीत हो उठते हैं। भँवरों को सबसे निकट से फूल सुनते हैं, भाव विभोर हो जाते हैं और शायद इसीलिये अपना पराग सिर्फ सौंपते ही नहीं उस पर इसका आलेपन भी उन पर कर देते हैं। 
इसी धारणा और अवधारणा से उत्प्रेरित ये ५१ गीत मुझ में सहज ही में उतर आये हैं। त्रिपथगा गंगा का ही एक नाम है जो हिमालय के तीन स्रोतों से निकल कर आती है और देव प्रयाग में आकर मिल जाती है यहीं से यह गंगा हो जाती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि गीत में बहती है त्रिपथगा। इस गीत संग्रह में से एक गीत की ये पंक्तियाँ कहती हैं जिसका शीर्षक है - गीत में बहती है त्रिपथगा।
अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें

इन गीतों को संभवतः संगीतमय धुन और स्वर के साथ गाया जा सकता है। इन्हें अकेले, युगल के रूप में या कोरस में भी गाया जा सकता है। मैं यह नहीं जानता कि ये कौन से छन्द हैं? ये किस शास्त्रीय अनुशासन की फ्रेम में फिट होंगे, या नहीं होंगे पर ये सहज सी भ्रमर गुंजन जैसे हैं। एक और प्रेरणा इन में संलिप्त सी है - जैसे प्रसाद की कृति 'आँसू' में आँसू, महादेवी के काव्य में 'दीपक' उनके श्रेष्ठ आलम्बन ले कर मानवीकृत हुए हैं उसी तरह मेरे ये गीत कहीं कहीं कुछ सुनने, समझने और कहने लगते हैं। कहीं कहीं ये आप से सीधे सीधे संवाद भी करते लगेंगे।
मैंने इनसे कहा है :-
रस - सागर
भर - गागर
पद-पद नव-नागर छन्द भरो!
जन-जन का गौरव शीश धरो!
स्वर-वैभव क्षण क्षण कण्ठ जगे
ऐसा नित नवल विधान करो!
      ऐ गीत मेरे तू गाता चल
      ले ले तू सप्तक साध सरल

      रामनारायण सोनी
         ९. ३.२५

Thursday, 6 March 2025

गीत में भी घुन लगे

गीत में भी घुन लगे

गीत में भी घुन लगे
बीज-से सुलने लगे
गा रहे जिसके कथानक
कान मूँदे वे अचानक
     शून्य में आलाप पंगु हो गये हैं
      जागरण के दीप प्रहरी, सो गये हैं

गीत की क्षुर धार बोथी
जल गई इस बार पोथी
मेंढकों का कूप में जग 
यह जिन्दगी दो चार पग
      लघु क्षितिज में स्वाँस बन्दी हो गये है
      बीन के स्वर-साज सारे, खो गये हैं

खिड़कियाँ सूनी पड़ी है
शून्य से आँखें जुड़ी हैं
गीत की ये मन्द्र ध्वनियाँ
अक्षरों की क्षीण छबियाँ
       वीथिका के पथ अनामी हो गये हैं
       गीत थे उनके लिये, वे प्रवासी हो गये हैं


रामनारायण सोनी
६. ३ . २५


मेघ बन कर देखता हूँ

मेघ बन कर देखता हूँ

गीत हूँ पर, 
मेघ बन कर देखता हूँ
भाव की मृदु बूँद ले,
रूखे अधर को सीचता हूँ

मैं पवन से,
मन्द सी गति मांगता हूँ
पुष्प-अलि सी वह मधुर,
नित-नवल रति मांगता हूँ
फिर न लौटूंगा कभी,
इस विरह की कन्दरा में
मैं प्रणय के देवता से
प्रिय पर समर्पण मांगता हूँ
गीत हूँ पर,
पुष्प बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ

मैं गगन से,
प्रात की रज मांगता हूँ
बाल रवि ने जो बिखेरी
वो स्वर्ण आभा मांगता हूँ
मैं मलूँगा गीतिका-मुख
स्वर्णमय चिर रोलियों को
मैं गगन से और रवि से
मधुमय विलेपन माँगता हूँ
गीत हूँ पर,
अर्घ्य बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ

रामनारायण सोनी
७.३.२५

Wednesday, 5 March 2025

आज उतरे मेघ मन पर



आज उतरे मेघ मन पर

आज उतरे मेघ मन पर 
उर धरा की तृप्ति ले कर
आज अम्बर की पलक पर झुक रहा सावन मुखर।
लोचनों में प्रीत भर कर मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर
क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार ले कर।।
तुम न आये प्यार का 
मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर 
आय या फिर ना आए।।


तुम प्रणय की रागिनी हो 
मैं बुनूँगा गीत मधुरिम
रेशमी फर सी फुहारों का सुनो तुम साज मद्धम।
आज मन का मोर यह कर यहा है नृत्य छमछम
प्राण में सुलगी अनल जो है बढ़ाती प्यास रिमझिम।।
तुम न आये प्यार का 
मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर 
आय या फिर ना आए।।


दीप मैं अविचल अकम्पित

दीप मैं अविचल अकम्पित


अंधकार पी पी कर भी तो 

मैं ना हारा ना थका कभी

जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी

मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी

जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ


कुटिया और महलों दोनों में 

भेद कभी भी नहीं किया

मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया

सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया

सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ


जलती ज्वाला शीष धरे 

अभिसिञ्चन उसका करता हूँ

अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ

चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ

शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ



बिखर गई कलिकाएँ

बिखर गई कलिकाएँ

सजल नयन
निमिष गहन
स्वप्न श्याम हो चले बुझे निश्वासों में जल
हर तृण, हर कण तेरे पथ की धूलि मल
अन्तर में गूँजी उजली-धुँधली गूँज पुरानी
लिख चले अश्रुजल फिर से करुण कहानी
         अक्षर अक्षर ले सत्वर धार चले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

सघन विरल
जन्म मरण
क्षत विक्षत इस ललाट की आभा चन्दन
वे कालग्रसित थे झरे पात, ले उड़ा पवन
इस नीरव पथ में बसी शून्य की अभिमानी
विधना के आलेख मरण की अमिट कहानी
         अविनश्वर नभ-पथ प्राण चले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

अक्षर अक्षर
खाली अम्बर
रजनी का कोरा अंचल तारक चंदा बिन
क्या पाती कह पाती बातें ये अक्षर बिन?
टूटी वीणा तन्त्री से कब निकली अमृत वाणी 
शूलों ने निज भाषा में पग पर लिखी कहानी
         पतझड़ में उपवन ने हाथ मले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

रामनारायण सोनी
६.३.२५

Tuesday, 4 March 2025

अभिनव मन का श्रृंगार रहे

अभिनव मन का श्रृंगार रहे

पथ में शूल बिछे कितने
तरु से फूल झरे कितने
लोचन को अपने मूंद-मूँद
करुणा क्षरती यह बूँद-बूँद
पथ, शूलों का आधार समझ
गत, फूलों का अधिकार समझ
      कितने पल हार लिये अब तक
      हर पथ के शूल गिनें कब तक
      गतिमय जीवन की धार रहे
      अभिनव मन का श्रृंगार रहे

तारक में छिपती उल्काएँ
मधु-रस में लिपटी छलनाएँ
इन कनक घंटों में तृषा भरी
स्वप्नों की पलकें क्षार भरी
अमृत के पहले वह विष होगा
मन्थन जीवन हित करना होगा
        प्रलयों के वार सहे अब तक 
        हर पथ के शूल गिनें कब तक
        पंकज सा जीवन-सार रहे
        अभिनव मन का श्रृंगार रहे

          रामनारायण सोनी
           ५.३.२५


Saturday, 1 March 2025

गा ले तू मन अभंग

गाले तू मन, अभंग

मैं शब्द-स्वरों का स्वन-संगम
चिर मौन गलित नीरव तरंग
उर-अम्बर का सुधि-नीलांचल
मैं तड़ित-रुचिर घन वीचि-भंग
      लघु-जीवन का निस्सीम क्षितिज
      प्राणों में बजती जल-तरंग
      गा ले मौजों में मन, अभंग

मैं शुचि श्रुतियों का उद्गाता
गति है गंगा सी धार विरल
प्राची के रोहित अश्वों का
हिन-हिन हूँ अनुनाद विकल
      लघु-दीप तमी के भुज प्रलंब
      श्वासों में उमड़ी चिर उमंग
      गा ले मौजों में मन, अभंग

उस बूढ़े वट की शाखा पर
तिनको का सुन्दर शीशमहल
शैशव का वैभव पाया था
भूलूँ कैसे सौभाग्य विपुल
      लघु-बीन वृहद स्वर सागर में
      आह्लाद गीत का अंग अंग
      गा ले मौजों में मन, अभंग

       रामनारायण सोनी
        २ .३ . २५

अभंग और भजन पर्यायवाची हैं। अभंग शब्द दो शब्दों "अ" और "भंग" से मिलकर बना है। भंग शब्द का अर्थ है टूटा हुआ और इसके आगे अ का अर्थ है अटूट या अटूट। अब अटूट या अखण्ड क्या है? इसे कई तरीकों से देखा जा सकता है:

  1. अभंगों में वर्णित विषय भगवान है - सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी भगवान - कोई है जो पूरे ब्रह्मांड पर निर्बाध और अनवरत कृपा बरसाता है |
  2. इन अभंगों में दिए गए भक्ति सिद्धांत, सार्वभौमिक सत्य अटूट हैं। ये सनातन सत्य हैं और इस दुनिया के अंत और उसके बाद भी रहेंगे।
  3. अभंग हर युग में प्रासंगिक हैं। चाहे वे किसी भी काल में गाए गए हों, उनकी प्रासंगिकता बरकरार रहती है। जब भी उन्हें गाया, सुना, पढ़ा और पढ़ा जाएगा, वे सभी उम्र के भक्तों को प्रेरित करते रहेंगे।
  4. अभंग जो खुशी और खुशी देते हैं वह अटूट है। ये अभंग आपको स्थायी और निरंतर खुशी की ओर ले जाते हैं। मन खुशियों का भंडार बन जाता है और फिर उस खुशी का कोई अंत नहीं होता।