जर-नीड में
गीत की स्वर-उर्मियों में
चेतना-त्वर-अश्व दौड़े
विरह के घन-तिमिर फैले
वेदना निश्वास छोड़े
स्वप्न के पाँखी रुपहली भोर में
जा छिपे हैं वे विवर की ठौर में
जड़-पलक ठहरी बरुनियाँ
अश्रु कण मसि-कोर ठहरे
निर्निमेषी शिथिल पुतली
हैं छोड़ती प्रश्वास गहरे
शून्य से सूने क्षितिज के छोर में
जागता यह कम्प घुल-घुल पोर में
दूर वासन्ती खड़ी है व्यंग्यना
यह क्यों पिकी भी मौन हैं
शाख के घन-पल्लवों में
झाँकता जर-नीड़ से यह कौन है
बुझ चले तारक निशा की क्रोड़ में
भैरवी के खो चले स्वर, शोर में
रामनारायण सोनी
२१.२.२५
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