आकुल उर का कण कण है
मेरे अन्तर के आँगन में
अब के रिमझिम सावन में
हैं उसी नेह के फूल, उसी ने बोये हैं
उर उर्वि में पाले मैंने
मृदु स्वप्नों में ढाले मैंने
बड़े यत्न से फिर, सुन्दर थाल संजोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन हैं
आकुल उर का कण कण है
ले लो तुम अंजुरि में धर लो
अपनी खाली झोली भर लो
ये विकल हृदय की, तड़पन में भिगोये हैं
कण्ठ रुद्ध है, कैसे गाऊँ
थके पगों से कैसे जाऊँ
गीत शब्द-भावों के, मोती माल पिरोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन है
आकुल उर का कण कण है
रामनारायण सोनी
१.३.२५