Friday, 28 February 2025

आकुल उर का कण कण है

आकुल उर का कण कण है

मेरे अन्तर के आँगन में
अब के रिमझिम सावन में
हैं उसी नेह के फूल, उसी ने बोये हैं
उर उर्वि में पाले मैंने
मृदु स्वप्नों में ढाले मैंने
बड़े यत्न से फिर, सुन्दर थाल संजोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन हैं
आकुल उर का कण कण है

ले लो तुम अंजुरि में धर लो
अपनी खाली झोली भर लो
ये विकल हृदय की, तड़पन में भिगोये हैं
कण्ठ रुद्ध है, कैसे गाऊँ
थके पगों से कैसे जाऊँ
गीत शब्द-भावों के, मोती माल पिरोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन है
आकुल उर का कण कण है

       रामनारायण सोनी
         १.३.२५

Wednesday, 26 February 2025

यह कैसा सुख है

यह कैसा सुख है

मेरे सूने थे खाली पल
निस्तरंग था ठहरा जल
बिम्ब सलोने सपने सा 
उभरा लहरों संग अमल
     इक सिहर जगी है इस तन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

अंबुद के इन फाहों में
झाँकी किरणें द्युति-मती
नभ के नील-पटल पर
आरेखित जैसे मदन-रती
     शिखि सा मन झूमा नर्तन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

यह देख दृगों में अश्रु भरे
छवि तेरी धूसर धूर हुई
यादों की गठरी खुलते ही
वेदना हृदय में पूर हुई
     यह कैसा सुख है क्रन्दन में
     छाई छवि छैल मुखर मन में

            रामनारायण सोनी
              २६.२.२५

Monday, 24 February 2025

तू अमल - तरल


तू अमल - तरल
हो सहज - सरल
उठ गीत सज्ज है नव-विहान
ऊषा का अरुणिम नभ वितान
भर अपनी लय में अंगराग
गा ले सविता के स्वस्ति-गान
      बीती तम घन की अमानिशा
      ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

तू झर - झर कर
कर हहर - हहर

स्वर्णिम कलशों से श्रृंग शिखर
जगती का कण-कण रहा निखर
कूजित कलरव कलहंसों का
तू मिला स्वरों में अपना स्वर
      प्यासी रजनी की बुझी तृषा
      ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

मुखर - प्रखर
उभर - निखर
शलभों में, कोमल कलिका में
लास्य, हास्य, उल्लास जगा
तू भी अब शब्दों- छन्दों में
मधुस्वर में मीठी तान जगा 
     धरणी में सौरभ-मान लसा
     ज्योतित हैं जग की दसों दिशा

रामनारायण सोनी
२५.२.२५

Sunday, 23 February 2025

प्रकृति और मनुज

उदधि अहर्निश बिना थके ही
निज-उर का मंथन करता है
खार-खार का पिये हलाहल
जग में मृदु-जल भरता है
      तप कर भी यह सिन्धु हमें क्या
      विकल वेदना कह पाता है
      
पुष्प खिले लघु-जीवन लेकर
बिखर-बिखर माटी में सोये
अपनी मधु के आसव-घट से
कितने ही मधुमास संजोये
       लघुता से शापित हो कर भी
       निज सर्वस्व लुटा जाता है

ज्वाल वर्तिका अपने माथे
धर कर भी सिंचन करती है
चाहे कितनी जले-तपे फिर
द्रव चुकने पर खुद जलती है
       उसका तन-मन, सारा जीवन
       फिर से लौट नहीं पाता है

किन्तु मनुज की बगुले सी ही
दृष्टि लोभ की मछली पर है
पहने मोहक मुखर मुखौटे
काजल सा काला अन्तर है
       भर कर भारी धन की गठरी
       साथ कभी क्या ले जाता है

                रामनारायण सोनी
                    २४.२.२५

Saturday, 22 February 2025

प्राण ! तुम जब से गये हो

प्राण! तुम जब से गए हो

उपवनों से रूठ कर वह
फिर नहीं मधुमास लौटा
टेसुओं के तप्त उर में
बस अगन का ताप छूटा
      अब निरा-पतझार ठहरा
      प्राण! तुम जब से गए हो

वेणु से उर की निकलते
बस विरागी स्वर बिचारे
चीर के इस यामिनी के
पड़ गये धूमिल सितारे
      हर शिरा में शून्य पसरा
      प्राण! तुम जब से गए हो

अनछुई, जागी छुअन क्यों
हो रही बोली अबोली
कुछ पलों की याद से ही
अश्रु ने आँखें भिंगो ली
       हर दिशा खुद राह तकती
       प्राण! तुम जब से गए हो

रामनारायण सोनी
२३. २ . २५

Friday, 21 February 2025

अर्चना का गीत हूँ

अर्चना का गीत हूँ

मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ

मैं बँधा हूँ काल में संसार सा
मैं गुँथा हूँ शब्द में, इक हार सा
उपवनों से सुमन की गंध लेकर
अंजली में प्रीत के उपहार सा
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ

पंथ में आरोह भी अवरोह भी
प्रेम के आलाप भी स्नेह भी
नृत्य करते इन पदों में घूँघरू
थाप में थिरकन भरे अवलेह भी
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ

अंग में प्रत्यंग में मेरे समर्पण
भावना में बद्ध मेरा सज्ज अर्पण
मन विरंजित साधना के अर्क से
सर्व निज मद-मान का हो विसर्जन
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ

रामनारायण सोनी
२२.२.२५



Thursday, 20 February 2025

जर- नीड़ में

जर-नीड में

गीत की स्वर-उर्मियों में
चेतना-त्वर-अश्व दौड़े
विरह के घन-तिमिर फैले
वेदना निश्वास छोड़े
     स्वप्न के पाँखी रुपहली भोर में
     जा छिपे हैं वे विवर की ठौर में

जड़-पलक ठहरी बरुनियाँ
अश्रु कण मसि-कोर ठहरे
निर्निमेषी शिथिल पुतली
हैं छोड़ती प्रश्वास गहरे
       शून्य से सूने क्षितिज के छोर में
       जागता यह कम्प घुल-घुल पोर में

दूर वासन्ती खड़ी है व्यंग्यना
यह क्यों पिकी भी मौन हैं
शाख के घन-पल्लवों में
झाँकता जर-नीड़ से यह कौन है
        बुझ चले तारक निशा की क्रोड़ में
        भैरवी के खो चले स्वर, शोर में

रामनारायण सोनी
२१.२.२५

Wednesday, 19 February 2025

तुम अनन्त के राही हो

तुम अनन्त के राही हो

यह जीवन-पथ है शूल भरा
यह शापित अम्बर धूल भरा
पद पद पर दुर्दम बाधाएँ
हर दिश से आती छलनाएँ
      सम्हलो ! अनन्त के राही तुम
      ऐसे क्षण नहीं सदा होंगे

ऋतु बदली वह शिशिर गया
नव अंकुर का नव जनम हुआ
भूलो रजनी के तम-घन को
खिलने दो बोझिल तन मन को
        कब पतझड़ बारह मास रहे
        इक दिन ये भी विदा होंगे

फेंको संशय के वल्कल को
देखो खिलते इन शतदल को
जग सारा एक समर - वन है
आशा इक दिव्य अमर धन है
        अपने भुज नित्य प्रलम्ब रहे
         अन्तिम फल जय-प्रदा होंगे

रामनारायण सोनी
२०.२.२५

गीत तुम पाती बनो तो !


गीत तुम पाती बनो तो !

सीख लो तुम शून्य - पथ में
पवन की गति संग उड़ना
पंख पर मेरे मृदुल से
अश्रु के उपहार धरना
      इस पुलक की, अश्रु जल की
      स्नेह की पाती बनो तो !

प्रिय - प्रवासी गीत तुम इस
नभ - निलय में खो न जाना
संवरण में लोभ के घन,
पथ - भ्रमित तुम हो न जाना
        विकल मन की वेदना की
        प्रेय की पाती बनो तो

जिस नगर की वीथियों में
सन्दली सौरभ प्रिया की
खटखटा प्रिय - द्वार को फिर
खोलना पाती जिया की
       चिर विरह की इस तपन की
       अश्रुमय पाती बनो तो !

रामनारायण सोनी
२०.२ . २५







 

Thursday, 13 February 2025

शब्दों की प्रतिच्छाया


शब्दों की प्रतिछाया

मसि से अंकित काया में
भावों के रंग संजोता हूँ
नीरव रजनी के तारक से
मैं चुन चुन माल पिरोता हूँ
     सुमनों के सौरभ अर्क लसी
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

प्रिय! और निकट आओ तो
जीवन-मधु-प्राश कराऊँगा
कटुता के कंटक बीन-बीन
मधुरिम पाथेय जिमाऊँगा
     यायावर उँगली थाम चलो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

स्वर-ताल-छन्द की सरिता में
थोड़ा अवगाहन कर देखो
तट के नत हैं तरु-तमाल 
इनमें रस-साल मला देखो
     स्वर-वैभव गौरव गान सुनो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

जीवन के खुलते पृष्ठों में
अनुभव का है अमरकोष
हत आशा है कुछ कहीं कहीं,
कहीं समर का विजय घोष
     इन गीतों का सम्मान करो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

     रामनारायण सोनी
        १४.२.२५


मैं शब्दों की प्रतिछाया

मसि से अंकित काया में
भावों के रंग संजोता हूँ
नीरव रजनी के तारक से
मैं चुन चुन माल पिरोता हूँ
     सुमनों के सौरभ अर्क लसी
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

प्रिय! और निकट आओ तो
जीवन-मधु-प्राश कराऊँगा
कटुता के कंटक बीन-बीन
मधुरिम पाथेय जिमाऊँगा
     यायावर उँगली थाम चलो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

स्वर-ताल-छन्द की सरिता में
थोड़ा अवगाहन कर देखो
तट के नत हैं तरु-तमाल 
इनमें रस-साल मला देखो
     स्वर-वैभव गौरव गान सुनो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

जीवन के खुलते पृष्ठों में
अनुभव का है अमरकोष
हत आशा है कुछ कहीं कहीं,
कहीं समर का विजय घोष
     इन गीतों का सम्मान करो
     मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ

     रामनारायण सोनी
        १४.२.२५

विषपायी मीरा

विष पायी मीरा

वाणी विष-पायी मीरा की 
कैसे अमृत की धार बनी
गीतों में, छन्दों, भावों में
कैसे जन जन का गान बनी
     उस अनन्य के आश्रय में
     शूलों में भी फूलों की गति-लय है

विश्वास मेरु सा दृढ़ स्थिर
गीतों में कृष्ण उतर आया
इकतारे का तार तुन-तुना
उसमें घनश्याम उभर आया
     चिर-विश्रान्ति-निलय में
     शूलों में भी फूलों की गति-लय है

सुधि के पल पुलकित हैं
प्राण में उत्सव रंजित है
जहाँ छाया भी लगती 'श्याम'
यही छबि उर में अंकित है
     हार की ही अन्तिम विजय 
     शूलों में भी फूलों की गति-लय है

रामनारायण सोनी
१३.२.२५

Wednesday, 12 February 2025

अश्रु का स्वाभिमान


झर गया अश्रु का स्वाभिमान

नयनों की पुतली तैर तैर
रज निगल गई खारा खारा
दो संपुट बीच पला मोती
द्रव दौड़ रहा मारा मारा
     दो पल को चमका दिव्यमान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कठिन क्षितिज की कारा से
मृदु-स्वप्न न बन्दी छूट सके
नियति नटी की पीड़ा को
कुछ पल को भी न भूल सके
     करुणा का हतप्रभ तृप्ति-दान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कोमल कलिका के अन्तस में
मुदमय मधुसंचय पलता है
पर विकास के पल में फिर
उसका लुट जाना खलता है
     फिर भी वह करती सुरभि-दान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

कुन्दन की खूब तपी काया 
तुमको सौदर्य नजर आया
कोयल का तो मर्म जला, पर
तुमको केवल स्वर भाया
     टूटा मन करता स्वस्ति-गान
     झर गया अश्रु का स्वाभिमान

रामनारायण सोनी
१२.२.२५

Tuesday, 11 February 2025

फिर से सजें हम

फिर से सजें हम

प्रार्थना में बस तपन है
श्वाँस में केवल अगन है
गीत क्या तुम देव को, इस तरह छलते रहोगे
क्या अधूरी, अधजली ही आस में जलते रहोगे
     पाश में क्यों मोह के हम?
     दूध बिगड़ा, क्यों मथें हम

संस्तुति के स्वर पनीले
इन तन्त्रियों के तार ढीले
काँपते वागर्थ से तुम, पथभ्रष्ट ही होते रहोगे
गठरियाँ बेचैनियों की, क्या सदा ढोते रहोगे
     तीव्र कुण्ठा से ग्रसें क्यों
     प्रबल पंखों से उड़ें हम 

मेघ बिन आकाश नीरव
शरद में श्री हीन पल्लव
उसरों में बीज श्रम के, व्यर्थ ही बोते रहोगे
शक्तियाँ तुममें अपरिमित, क्या युँही खोते रहोगे
     मरु-मृदा का मान कैसा
     तरु-लता से फिर सजें हम

रामनारायण सोनी
१२.२.२५

Monday, 10 February 2025

तू गाता चल

तू गाता चल!

अक्षर - अक्षर
मन्थर - मन्थर
गति का मुदमय मंगल-स्वन
दिक के नूपुर करते रुन झुन
नभ में नव नीरद नाद घुले
मन के शिखि पग जागा नर्तन 
     ऐ गीत मेरे तू लय-पथ चल
     बो ले तू उर-उर बीज विरल

अनघ - अमल
तरल - विरल
ओ नीरव सर के नीलकमल!
चिर समाधि में रत अविचल
पत्रों पर मुखरित मुक्ताहल
तल-ताल तरंगित हो उर्मिल
     ऐ गीत मेरे तू हो झिलमिल
     भर ले तू अन्तर्नाद विमल

रस - सागर
भर - गागर
पद-पद नव-नागर छन्द भरो!
जन-जन का गौरव शीश धरो!
स्वर-वैभव क्षण क्षण कण्ठ जगे
ऐसा नित नवल विधान करो!
      ऐ गीत मेरे तू गाता चल
      ले ले तू सप्तक साध सरल


रामनारायण सोनी
११.२.२५

गीत में बहती त्रिपथगा


गीत में बहती त्रिपथगा

अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
गीत में बहती त्रिपथगा
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें

हिमशिखर का पय पिघल पावन हुआ
पाहनों का स्नेह से, निर्झरों ने तन छुआ
उत्स के, सद्धर्म के द्रव ले कर बही यह
गीत-गंगा ने समर्पित प्रीत का सागर छुआ
प्रीत की देवापगा की
इस सुधा का पान कर लें
जयति जय जय गान कर लें

आदियुग से धार में है ऋत ऋचायें बह रही
चिर सनातन-संस्कृति की गूढ़ गाथा कह रही
गीत-गंगा, सदा नीरा, रव कलित कल कल
नव-रसों से शुभसृजन कर अमृता नित भर रही 
संस्तुति माँ शारदे की
स्वस्ति के शुभगान कर लें
जयति जय जय गान कर लें

रामनारायण सोनी
१०.०२.२५

Thursday, 6 February 2025

वागर्थ

वागर्थ 

शब्द में क्यों घोल कर विष
घूँट भर मुझको पिलाया
गीत! मैं था नीड़ में नीरव पड़ा
क्यों झिंझोड़ा? क्यों जगाया?
     मित्र हो या वैर का प्रतिमान तुम
     चेतना या चिन्तना के गान तुम?
     जान कर भी कण्ठ में तुमको बसाया

अर्थ शब्दों से विलग क्यों
भाव की भव भूमि रोती
याद के संपुट पुटों में 
अधपके उपजाय मोती
       क्यों भरे पतझड़ मेरे मधुमास में
       व्यंग्यना अतिरंजना के गान तुम
       मान कर भी अलख तेरा ही जगाया

रामनारायण सोनी
७.२.२५

सृजन के संकल्प

सृजन के संकल्प

तुम प्रणय के गीत हो या
हो प्रयाणों के प्रलय पल
रुक गये यदि हो विकम्पित
लह न पाये धार अविरल
मृत्यु तुमको ढूँढ लेगी, पाहनों के प्रस्तरों में
शब्द की इस देह में, भाव के घन विह्वरों में
स्वर-सुधा का पान कर लो
गति-साध का आधान कर लो

अग्नि-शर या विपुल बाधा 
कंटकित या हो सुमन-पथ
जब साधना की सिद्धि में 
कर रहा हो स्वेद लथ-पथ
रत रथी हो या विरथ हो, दुरभि पल में या वरों में
लक्ष्य के संकल्प के थिर, सत्यव्रत हों निज करों में
जयति-जय का गान कर लो
स्वर-नाद का अवधान कर लो

रामनारायण सोनी
७.२.२५

Wednesday, 5 February 2025

गीत के अनुनाद सुन

गीत के अनुनाद सुन

हीरकों के नत निमन्त्रण
स्निग्ध स्वर का विस्तरण
मुग्ध - अक्षर
पुलक - मर्मर
ज्योति के आलोक पथ में, गीत के स्पन्द बिखरे
आज अन्तर ने उँडेला, लास्य-मय रस रंग उभरे
रागिनी! तुम भी चलो

विद्रुमों के नवल वल्कल
सुमन सौरभ बहे अविरल
उर्मि - अर्पण
विरल - दर्पण
रागिनी के ध्वनित रथ में, कर्णप्रिय अनुनाद सँवरे
मुदित मन की तन्त्रियों में, नव सुकोमल छ्न्द उतरे
कामिनी! तुम भी सुनो

सद्य अरुणिम रश्मि प्राशन
उर धरा का लोल आनन
गा - प्रभाती
रज - सुनाती
द्रुत विलम्बित प्रगत गत में, भैरवी के गान निखरे
स्वर अलिन्दों के मुखर हो, गीत के मन-प्राण विहरे
स्वामिनी! तुम भी सुनो

रामनारायण सोनी
६.२.२५

Monday, 3 February 2025

गीत! मेरे तुम विहग वर

गीत! मेरे तुम विहग वर

छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर

नील - अम्बर 
चीर - प्रस्तर
रूप लय का ढूँढ लाओ
स्वर्णपथ में दौड़ जाओ
प्रियतमा की लास्य-मय छबि में सँवर कर
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर
अरुण - प्राची
रंग - राची
रश्मियाँ पिचकारियाँ भर
व्योम पीता सोम मन्थर
सुस्मिता के वे हास - मय अस्फुट अधर 
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर

तरु - लताएँ
स्वर - सजाएँ
वेणु से मधु रागिनी झर
गा रहे नवगीत निर्झर
कामिनी के रास - मय वे स्वरित नूपुर
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर

रामनारायण सोनी
४.२.२५

Sunday, 2 February 2025

नेहिल नीर बिन्दु

नेहिल-नीर बिन्दु

छलके जब नेहिल-बिन्दु नीर
गीतों की अधजल गगरी से
पलकों की कोरी कोरों से
भींगे भींगे से स्वप्नों का, अधिभार लिये आना!
फिर लौट नहीं जाना!

बदली के कोमल आँचल में 
टिम-टिम करते तारक जब
लुक-छिप नटखट ठहरे जब
अवगुंठन हो जाने का, स्वीकार लिये आना!
फिर छूट नहीं जाना!

चंचल चितवन की हीर कनी
मन की मुँदरी के बीच मढ़े
दो नयन ठिठक कर रहें खड़े
प्रिय! मौन हृदय की मीठी, मनुहार लिये आना!
फिर भूल नहीं जाना!

कोकिल की, शुक की तान ज़ुड़े
बिखरे सौरभ नव कुसुमों की
स्वर लहरी गूँजे शलभों की
किंकिनी-नूपुर की मृदु सी, झंकार लिये आना!
फिर रूठ नहीं जाना!
 
रामनारायण सोनी
३.२.२५