Wednesday, 25 December 2024

योगिनी हो कर खड़ी है

तुम हृदय की वेदना संचेतना
कोकिला की कूक सी प्रतिवेदना
स्वाँति के घन में धधकती प्यास ले
रट रहा फिर भी पपीहा अनमना
        चिर पिपासा इन अधर की
        बंदिनी हो कर खड़ी है

हैं लता के पाश में वह मौन तरुवर
खंजनों के नैन हों जैसी रुचिर
मेघना में तड़ित छबि का हास ले
वह कौमुदी के अंक में बंदी भ्रमर 
         चिर प्रतीक्षा प्रिय मिलन की
         मानिनी मन में बड़ी है

यामिनी जो ज्योत्सना का पान करती
स्वाँस में प्रस्वाँस में अनुबन्ध करती
चिर विरह की आग चकवी सह रही
अस्त हो जा चाँद, केवल आस करती
          चिर प्रभंजन इस जलन की 
          योगिनी हो कर खड़ी है

रामनारायण सोनी
२५.१२.२४

Friday, 13 December 2024

ये विकल नयन

ये विकल नयन

जो हृदय चाहता था कहना 
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया

सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी

मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं की वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल

महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा

सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है

सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले

अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों के भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं

गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े

सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ 
ना शीत निशा से बच पाई

रामनारायण सोनी
१२.१२.२४


संशोधित

Wednesday, 11 December 2024

ये विकल नयन

ये विकल नयन

जो हृदय चाहता कहना है
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया

सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी

मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल

महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा

सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है

सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले

अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं

गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े

सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ
ना शीत निशा से बच पाई

रामनारायण सोनी
१२.१२.२४