वागर्थ
शब्द में क्यों घोल कर विष
घूँट भर मुझको पिलाया
गीत! मैं था नीड़ में नीरव पड़ा
क्यों झिंझोड़ा? क्यों जगाया?
मित्र हो या वैर का प्रतिमान तुम
चेतना या चिन्तना के गान तुम?
जान कर भी कण्ठ में तुमको बसाया
अर्थ शब्दों से विलग क्यों
भाव की भव भूमि रोती
याद के संपुट पुटों में
अधपके उपजाय मोती
क्यों भरे पतझड़ मेरे मधुमास में
व्यंग्यना अतिरंजना के गान तुम
मान कर भी अलख तेरा ही जगाया
रामनारायण सोनी
७.२.२५
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