Tuesday, 28 January 2025

उठ कर गिरूँ

उठ कर गिरूँ 

संवेदना के सिंधु का मैं
बिन्दु हूँ, तप से तपा हूँ
आरोह का अभिसार ले
श्यामघन में आ छुपा हूँ

मैं उठूँ, उठ कर गिरूँ उन
कण्ठ में प्यासे पड़े जो
ताकते नभ में विकल से
आस में कब से खड़े जो

मैं उठा, उठ कर गिरा हूँ
और गिर कर, फिर उठूँगा
शुष्क वसुधा की शिरा में
तृप्ति ले फिर फिर बहूँगा

मैं गिरूँ वन प्रान्तरों में
कर सकूँ अभिषेक इनका
सृष्टि का पोषण करें, खुद
दान कर निज सम्पदा का

सिन्धु से उठ कर चलूँ
गन्तव्य फिर से सिन्धु हो
पन्थ में पाथेय नित नव
अभिसिक्त हर रज बिन्दु हो

रामनारायण सोनी
29.1.25



"सिंधु से उठना और उसी में विलीन होना तो बादल ही करते हैं प्यासी धरा को रससिक्त करने के बाद कुछ बचा तो उत्स तक जायेगा।उमड़ी कल थी मिट आज चली जैसा  मामला नहीं है।"
डॉ. जया पाठक


माननीया आप आचार्य रही हैं, हैं भी, आपको उसी प्रणतभाव से प्रणाम करता हूँ। कविता तुरीय से पुनः तुरीय की यात्रा है। सिन्धु, बिन्दु, बादल, धरती, धरती के जीव उपाधियाँ अथवा साधन हैं। जल इसका आत्मतत्व है। बादल, बूँद, समुद्र इसकी अवस्थाएँ हैं। गति का स्रोत चेतना है। 
असल में यह कविता एक अन्तर्बोध का प्रतिबिम्ब है। इसमें 'गिरूँ' शब्द 'पतन' का पर्याय नहीं अपितु यह कर्म के लिये आवश्यकीय क्रिया है, यात्रा है। चलना, बहना, गतिमान होना जीवन की जीवन्त प्रक्रिया है।

माण्डूक्य उपनिषद के आधार पर :-

सिंधु यहाँ आत्मा के लिये प्रतीक है। सर्व्ँह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।।१।।

हिंदी अनुवाद :
यह सब (जिसे हम नाम और रूप से जानते हैं) जगत ब्रह्म है, आत्मा ब्रह्म है, ब्रह्म या यह आत्मा चतुष्पाद (चार पैर वाला) है। (यहाँ अलंकारिक भाषा में आत्मा या ब्रह्म को चार पदों वाला बतलाया गया है)

सिंधु का तत्वबोध जल ही है। गागर में भर लो तो गागर का परन्तु तत्वबोध में जल है। भाप बनने पर वाष्प का भी तत्वबोध जल ही है। वाष्प इसी जल की उपाधि है जो सिन्धुरूपी परम कारण की ही अवस्था अर्थात् पाद है। बादल अर्थात् वाष्प का संघनित होना बूँद है। यह द्वितीय पाद अर्थात् यह तात्विक जल की ही दूसरी उपाधि है। इस बूँद का नदी, तालाब, धारा, झरना आदि बन जाना तात्विक जल की तृतीय उपाधि है। इस जल का सिंधु में लौट जाना जल के परम कारण अर्थात् सिंधु में लौट जाना आत्मा अर्थात् ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। 
धरती पर रमण करने वाला उपाधि रूप "स्थूलभुग्वैश्वानरः" है, बादल से बना बूँद "प्रविविक्तभुक्तैजसो" तैजस है। बादल जो बूँद का वाहक है तात्विक जल का "चेतोमुखः" उपाधि वाल प्राज्ञ तृतीय पाद है। 
सिंधु स्वयं तात्विक जल का चतुर्थ पाद तुरीय है। वास्तव में तो यह पाद निरुपाधि है जिसे हम ओंकार (ॐ) के वाचक नाम अथवा प्रणव के नाम से जानते भर हैं। यही स्रोत है यही गन्तव्य है। जैसे आप कहीं प्रोफेसर हैं, कहीं स्त्री हैं, कहीं वक्ता है पर कार्यरूप से ये बाह्य उपाधियाँ ही हैं। कारण रूप में आप एक आत्मा हैं। तत्वमसि ॥तत् त्वं असि॥ 
आपने इस चिन्तन को आश्रय दिया। साधु।
यह कविता उस उपनिषद् के समग्र चिन्तन का प्रतिबिम्ब है। कोई भी इसे पढ़ कर इसके स्थूल अर्थात् वैश्विक स्तर को ही देख पायेगा।  क्षमा करें। यह कोई ज्ञान नहीं मेरे अन्तर में अवस्थित बोध का प्रतिबिम्ब है, क्योंकि अनुभूतियाँ शब्दाकार नहीं हो सकती है, वह भावभूमि का निर्बीज फल है। 
"निगमकल्पतरोर्गलितं फलं, शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं, मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः।।"

      सादर वन्दन
      रामनारायण सोनी

Monday, 27 January 2025

निर्झर सी दो दो आँख झरी

निर्झर सी दो-दो आँख झरी

इन सुलगे गीतों के तन को
मृदु नेहिल छुअन अपेक्षित है
इसकी क्षत-विक्षत सुधियों का
सहमा मन-प्राण विकंपित है
     स्वर के अंचल में गाँठ पड़ी
     निर्झर सी दो-दो आँख झरी

विरही इन गीतों की उर्मिल
करुणा-वरुणा अवशेष हुई
टूटा तारक काली रजनी में
अंतिम पथ की अवरेख हुई
     वाणी रसना से रूठ खड़ी
     निर्झर सी दो-दो आँख झरी

मधु-सिंचित अमृत-कोशों से
अक्षर-अक्षर रस रंग ढले
गीतों के अन्तस में फिर क्यों
तपते स्वप्नों की प्यास पले
     शब्दों में तीखी फाँस गड़ी
     निर्झर सी दो-दो आँख झरी

इस विकल वेदना ने आ कर
गीतों को पल पल तड़पाया
गूँजा विहान निश्वासों से
अम्बर का जी भी भर आया
     क्यों संसृति लिये कृपाण खड़ी
     निर्झर सी दो-दो आँख झरी

रामनारायण सोनी
२८.१.२५

Friday, 24 January 2025

फिर से अलसाये गीत जगे

फिर से अलसाये गीत जगे

गीतों की झिपती पलकों में
थे अभी अभी सपने सोये 
जो जागे जुगनू-जंगल में
सिकता में अपने आँसू बोये
      फिर से नीरव में प्रेम पगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

थी एक कहानी दबी छुपी
जिसमें सौरभ थी घुली मिली
उन पोथी के पीले पृष्ठों में
जो दबी मधुर मुस्कान मिली
      सूखी पँखुड़ी में प्राण जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

फिर कदम्ब की डाली पर
हौले से इन्दु उतर आया
था धवल धरा से उसकी वो
प्रिय का प्रिय बिम्ब उभर आया
      हर पोर पोर उल्लास जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

तितली के पंख पराग सने
मधु रंजित धूसर-धूलि हुई
गीतों का गात सिहर उठता
जैसे सहसा हो तड़ित छुई
      कानन में सौ सौ फाग जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

रामनारायण सोनी
२४.१.२५

Tuesday, 21 January 2025

लौट जाओ फिर वहीं तुम!

लौट जाओ फिर वहीं तुम!

तुम अभी लौटे क्षितिज से
ले चिट्ठियाँ कोरी करों में
क्या सभी पनिहारियाँ वे
सब मौन थी बैठी घरों में
      बिन लिखे संवाद कागज
      ए पवन! क्यों ज्वाल लाये
      लौट जाओ फिर वहीं तुम!

हिम शिखर की उर्मियों तुम 
सब सँदेशे भूल आई
अंक में अपने सुलगते
क्यों विरह के दंश लाई
       बिन स्वरों के गीत की तुम
       ए लहर! क्यों बात लाई
       लौट जाओ फिर वहीं तुम!

नील नभ के ओ प्रवासी
रीते आये उस नगरी से
प्यास बुझेगी मन की कैसे
लाई रीती इस गगरी से
        बिना खबर के अग्रदूत तुम
        ए मेघ! यों ही व्यर्थ आये
        लौट जाओ फिर वहीं तुम!

   रामनारायण सोनी
    २२ जनवरी २५

Monday, 20 January 2025

तुम्हार कैसा स्वप्नाकाश

तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

सुप्त अधरों की कलिका में
अचानक जागे क्यों स्पन्द
व्यथा का सूना था यह गाँव
थकित नयनों के पट थे बन्द
       हरिक आहट पर देती कान
       तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

हुए वे सौरभ सब दिग्भ्रान्त
ठगी ठिठकी है चपल पवन
चकित सा यह सूना संसार
उभरती हिय में तीव्र जलन
        विकल वीणा के विस्मित तार
        तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

नियति से नित नूतन संघर्ष
बरसते मेघों से अवसाद
हृदय की धीर धमनियों में
मचाते हैं अतिशय उन्माद
         बिछे इन पथ में पागल प्राण
         तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

प्राण के आकुल कितने प्राण
त्वरा के पग घुँघरू झनके
कपोलों पर तारक से बिन्दु
छलक कर नीरव में ढुलके
        जुन्हाई का टूटा अधिमान
        तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

रामनारायण सोनी
२१.१.२५


Friday, 17 January 2025

राष्ट्र देव

राष्ट्र देव

अपना चिर संचित पुण्यकोष
जग के अरण्य में महका है
विपुल धरा का कण-कण भी
यूँ चंचरीक सा चहका है

ऋषियों की वाणी ऋतम्भरा
हवि संग ऋचाओं का होता
पावन यज्ञों की समिधा से
मंगलमय हवन जहाँ होता

हैं श्रृंगशिखर ये कनक मढ़े
हैं वृक्ष रूप में रोम खड़े
अंगों से बहता पावन जल
इस नग विराट के दान बड़े

भूतल पर बहती सरिताएँ
संस्कृति की ये पुष्ट शिराएँ
श्वेत श्याम इन पाषाणों से
निर्मित देवों की प्रतिमाएँ

भू भाग घिरा जो सीमा से
केवल वह, राष्ट्र नहीं है
जन गण मन भाषा भाव जुड़ें
समझो सब राष्ट्र यही है

उत्तर में उन्नत नग विशाल
केसर सौरभ से लसित भाल
प्राची पश्चिम के भुज प्रलम्ब
उर में संस्कृति की विजय माल

दक्षिण में द्रविड़ धरोहर है
वैभव का मान सरोवर है
आदिकाल की परम्परा का
पालक पोषक तरुवर है

आएँ मिल कर करें वन्दना
राष्ट्र देव की करें अर्चना
विश्व-गगन में, सर्व दिशा में
विजय गान की गूँज-गर्जना

भारत फिर से हो विश्व गुरू
फिर से जानें रघु और पुरू
वसुधा के कोने कोने में
हों फिर से गौरव गान शुरू

राष्ट्र सुरक्षित और सबल हो
कोटि कण्ठ जयघोष करें
कोटि करों से संकल्पों का
जन जन मिल उद्घोष करें

रामनारायण सोनी
१८.१.२५

जैसे तुम आई

जैसे तुम आई 

चंचल चितवन के आतुर से
मृग-शावक दौड़े आते हैं
नभ में आकुल से श्याम मेघ
अलकावालियाँ लहराते हैं 
        बँकपाँति वेणी सी बीच बीच
        सुभगे! तुम अन्तर में आई

रँग रहा मदन यह अन्तर-पट
कुछ बिम्ब निराले औ' नटखट
आगत के स्वागत में विह्वल
उस पंथ बिछे हैं नयन निपट
        उज्ज्वल स्मृति की रेख खींच        
        सुचिते! तुम बदरी सी छाई

इन तृषित नयन की सँझवाती 
पुतली के गोलक आराती
दीपित दीपों की कनक किरण
अनुबन्ध मिलन के दोहराती
        उर के भावों को सींच सींच
        तुम! नव-कलिका सी मुस्काई

सज्जित कानन का पोर पोर
नवअंकुर लखता हो विभोर
झरता पद्मों का पद्मराग
गुम्फित शलभों का मन्द्र शोर
         विहगों का मधुरव बीच बीच
         शुचिते! हर ओर लगा कि तुम आई

रामनारायण सोनी
१८.१.२५

Thursday, 16 January 2025

तु हहर हहर कर बह निर्झर

तू हहर हहर कर बह निर्झर

जल की धारा को दूध बना
निज गिरने को उत्कर्ष बना
माना पाषाण बिछे तल में
उन पर भी धीरे ही बहना
          कहो! डरता है मुझसे डर
          हहर हहर कर बह निर्झर

रेवा की धारा धुआँ बना
सत का शिव संगीत सुना
गति का रुक जाना मरना है
है बहना जीवन को पाना
          वह पथ ना जाय बिसर
          हहर हहर कर बह निर्झर

तुझमें इक इन्द्रधनुष होगा
तेरा कण कण भी खुश होगा
तेरी करुणा से तृप्त पवन
तेरा यह धवल वपुष होगा
          जगत यूँ जाए ना बिफर
          हहर हहर कर बह निर्झर

कलित कल कल करती धार
बाहुओं का दोनों विस्तार
हृदय में अनहद का अनुनाद
पगों में शिला बनी आधार
          जगत है सारा एक समर
          हहर हहर कर बह निर्झर

शीश पर धारा का अभिषेक
पगों से बहती जल अवरेख
लजीली लतिका की झालर
बने सब अर्चन के आलेख
          नियति के फूटे हैं निर्झर
          हहर हहर कर बह निर्झर

रामनारायण सोनी
17.1.25

Tuesday, 14 January 2025

आदमी के भीतर के आदमी

आदमी के भीतर के आदमी

तुम में एक आदमी ऐसा है जो ओरीजनल है,  जो बचपन में अकेला था। वह बाहर आता था  जस का तस ही। जो सोचता था वही बोलता था, जो करता था वह भी अपनी विशुद्ध सोच के अनुसार। उस आदमी की अपनी खिंची सरल रेखा थी, वैसी ही राह बनाता था और अपनी उसी राह पर चलता था।
पर बाद में इसके अलावा कई और आदमी भी उस आदमी में घुस गये, कहना चाहिये एक भीड़ की भीड़ उसमें घुस गई। ये सब अपने अपने विचार और समझ ले कर घुसे। इनमें शामिल थे एक प्रोफेशनल, एक रिश्तेदार, एक दो मुहा, एक अतिवादी, एक प्रेमी, एक नायक, एक खलनायक आदि आदि। अब मूल आदमी वयस्क हो कर तरह तरह के आदमियों से भरा तेतरी चिड़ियाखाना हो गया। सब के सब रंगमंच के पर्दे के पीछे बैठे रहते हैं। एक एक करके आते हैं, अपनी कला-कौशल दिखाते हैं और फिर नेपथ्य में चले जाते हैं। इस रंगमंच का सूत्रधार मूल आदमी ही है। सामने प्रेयसी हो तो प्रेमी निकलता है, ग्राहक खड़ा हो तो व्यापारी निकलता है। जब जो जरूरत पड़ जाय वैसा आदमी निकलता है। 
यहाँ तक तो लगभग ठीक ही है पर कभी कभी निकले इस एक आदमी के पीछे दुबक कर पीछे दूसरा आदमी खड़ा हो जाता है; शायद इनके लिये ही कहावत बनी है "मुह में राम, बगल में छुरी"। ऐसे में दिखता कोई और है, करता कोई और है। दिखने वाला मुखौटा है, करने वाला वह पीछेवाला है। 
वो परमहंस है जो अपने भीतर एक ही आदमी रखता है। वह दानी है जो सिर्फ बाँटता है, प्रतिफल नहीं चाहता। वह गुरू है जो तारता है। प्रकृति ने मौलिक रचनाएँ की है। सूरज में केवल सूरज, चाँद में केवल चाँद, आग में केवल आग बनाई। वहाँ वही है जिसके लिये मौलिक सृजन हुआ है। हम में भी मौलिक एक आदमी ही आया था। हमने कॉपी पेस्ट करके कई बिम्ब खड़े कर लिये, आदमियों की एक भीड़ खड़ी कर ली। भीड़ है तो भगदड़ मचेगी, भीड़ है तो कोलाहल होगा, भीड़ है तो अनियन्त्रित रेला होगा। भीड़-भाड़ में भीड़ के साथ प्रयुक्त भाड़ से शायद तात्पर्य यह है कि कहीं तो आग जल रही है जिसकी तपिश से सारे दानों में विस्फोट होता है। सारे दाने एक साथ आवाजें करते हैं। कई कई आवाजें। ये दाने बाद में दाने नहीं होते पॉप कॉर्न हो जाते हैं। भाड़ में स्वयं दानों की भीड़ ही है। 
जीवन स्वयं एक रंगमंच है, मन सूत्रधार है, बुद्धि अनुशासक हो और यह समग्र तुम हो, मैं हूँ, सब है। यह मैं नहीं, कठोपनिषद कहता है। 
इसमें अपने रथ के स्वामी आप स्वयं हैं। जैसा चाहो वैसा हाँको। अपने भीतर थोड़ा झाँको।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

रामनारायण सोनी
१५.१.२५

मित्रों!
हमारे वेदान्त जीवन के व्यवहार में उतरें तो हम सनातन की ओर लौट सकते हैं।

Sunday, 12 January 2025

मेरे जीवन के भोले स्वप्न


मेरे जीवन के भोले स्वप्न

सहज ममता की गोद पले
दबी आशाओं का उपवन
सहमते सिकुड़े कृश वे गात
अधखिली कलियों सा बचपन
        छुड़ा कर जाता निष्ठुर हाथ
        भाग्य ने असमय किया अनाथ

नहीं थे पद में भी पदत्राण
ठिठुरते महाशीत से प्राण
मचा करता तन में रौरव
संभलता उठता गिरता मन
          मर्म में सोये स्वर्णिम स्वप्न
          बँधाता ढाढस केवल मन

शीश पर केवल नील गगन
हृदय में केवल टीस चुभन
जीवनी केवल थी आधार
कोई था थामे हर धड़कन
          चला जब श्रम-निर्झर वह मौन
          चला था संग न जाने कौन

टाट के बस्ते रखी किताब
उँगलियों पर था सभी हिसाब
श्याम थी पट्टी, पट भी श्याम
छ्ड़ी का, गुरु का बड़ा रुबाब
          गणित का समवेती वह गान
          याद है बालसभा का ज्ञान

स्वप्न बादल के छौनों से
उछल कर आते कोनों से
रचा करते नित नूतन बिम्ब
बात करते थे पवनों से
          इन्हीं में कितने हुए मगन
          इन्हीं ने ढाला है जीवन

स्वप्न थे वे जीवन के गीत
कभी ना बिछड़े ये मनमीत
सभी के अपने हैं संसार
यही है जीवन के संगीत
          कभी बतियाता इनसे मन
           बना जीवन जिससे मधुबन

रामनारायण सोनी
१३.१.२५

Thursday, 9 January 2025

आस के बादल न बिखरे

आस के बादल न बिखरे

क्षिप्त मन के पृष्ठ पर 
अंकित सभी तेरी कथाएँ
क्यों करुण के राग में ये
व्यथित हैं सब गीतिकाएँ
        लोचनों की कोर भींगी
        स्वप्न के मुक्ता न बिखरे
        
साँझ का या भोर का नभ
नीरदों का रंग लोहित
संधियाँ दिन की निशा की
संवेग से होती विकम्पित
        भित्तियाँ उर की पनीली
        गान पीड़ा के न उभरे

सुप्त वंशी के हृदय में
है प्रतीक्षा बस पवन की
रंध्र में स्वर चेतना भर
जिन्दगी जागे विजन की
        बिजलियाँ कितनी कँटीली
        आस के बादल न बिखरे
       
कामना के विहग उड़ कर
नीड़ में फिर लौट आये
रात सोयी नभ निलय में
प्राण! तुम ना लौट पाये
        वादियाँ मन की रुपहली
        उम्र बीती तुम न बिसरे
        
रामनारायण सोनी
10.1.25

Sunday, 5 January 2025

गीत अधरों पर धरे हैं



गीत अधरों पर धरे हैं

गीत मेरे प्रीत की रसगंध ले कर
शब्द सारे भाव के सम्बन्ध ले कर
चिर प्रतीक्षा खुद खड़ी दहलीज पर
सज्ज प्राणों का मुकुल है यह विवर
         ओ सुनयने, पंथ का पाथेय ले
         गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं

तारिका निस्तब्ध अवनी झाँकती सी
दीप की लौ भी पवन से काँपती सी
वृन्द कानन के तृणों में कम्प कैसा
बद्ध छन्दो में घुली तुम आरती सी
         ओ सुनयने, कण्ठ का आधार ले
         गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं

शतदलों के पत्र पर अंकित निमन्त्रण
लोल लहरों में विरंजित लास कण 
अंजुरी भर प्रीत का आभार ले कर
सब विसर्जित रूढ़ियों के आवरण
          ओ सुनयने, थाल भर श्रृंगार ले
         गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं

रामनारायण सोनी
५.१.२५


Thursday, 2 January 2025

रास रमने की घड़ी है

रास रमने की घड़ी है

ए पवन तुम बाँसुरी में 
फिर बहो एक बार आओ
चिर चिरन्तन रागिनी के
फिर मधुर स्वर वे जगाओ
        आँगने में इस कुटी के 
        आ, आज कान्हा फिर पधारे

घन गरजते निज स्वरों में
पग पैंजनी धर आ मयूरा 
कण्ठ में मल्हार भर ले
छम छमा, कर नृत्य पूरा
         इस सघन छाया-वटी में
         आ, आज कान्हा फिर पधारे
      
झूम लो रे द्रुमदलों तुम
ए लता बन जा हिंडोला
हर बटोही बाट का है
सुध बिसारे पन्थ भूला
         उत्सवी नियती नटी तू
         आ, आज कान्हा फिर पधारे

मौन क्यों पाषाण गिरि के
थी छैले छबि तुमने निहारी
वह कामरी काँधे धरे था
यहँ, गोप संग नाचा बिहारी
         नाच ले आजा लकुटी तू
         आ, आज कान्हा फिर पधारे

ओ यमुन के तट चलो अब
कुंजरों तुम आ मिलो सब
उठ करो श्रृंगार गिरिवर
गोप, गोसुत फिर मिलें कब
         साँवरे की लख लटी तू
         आ, आज कान्हा फिर पधारे

आ, रे! पपीहे टेर कर ले
कोकिला मृदु तान भर ले
क्यों उदासी हो कदम्बों
हर दिशा उल्लास भर ले
          रास रमने की घड़ी है
         आ, आज कान्हा फिर पधारे

रामनारायण सोनी
३.१.२५
         

Wednesday, 1 January 2025

कहाँ ले जाता मुझको मौन

कहाँ ले जाता मुझको मौन

सपन सोये हैं हो कर क्लान्त 
विकल मन ढूँढ रहा एकान्त
निशा में ठहरा मत्त समीर
मधुप उपवन के हैं दिग्भ्रान्त
     अभी मैं लौटा अपने ठाँव 
     कहाँ ले जाता मुझको मौन

खुले रजनी के श्यामल केश
पलक पट में आशा है शेष
सुमन का सोया है श्रृंगार
अतल के शोर हुए अवशेष
       अभी मैं आया अपने गाँव
       कहाँ ले जाता मुझको मौन

नील नलिनी के बन्द कपाट
गा चुके विरुदावली भी भाट
स्वाँति के उमड़े जलद सघन 
निगलता जाता गगन विराट
        अभी हैं थके थके ये पाँव
        कहाँ ले जाता मुझको मौन

खड़े क्यों बने बिम्ब उस पार
सरित की मन्थर चलती धार
ललित लतिका के उठते दोल
पुहुप में सौरभ का अधिभार
          अभी उन्मन है अपनी नाव
          कहाँ ले जाता मुझको मौन

रामनारायण सोनी
२.१.२५