Thursday, 22 August 2024

हे मेरे मन!


हे मेरे मन !

हे मेरे मन !
तू लालायित ही रहता है सदैव
अनदेखा देखने को
अनसुना सुनने को
अनछुआ छूने को
पा नहीं सका उसे पाने को
हे मेरे चंचल मन !
अविश्वसनीय पर विश्वास करता है
विश्वसनीय का उपहास करता है
अकल्पनीय का अजब गजब 
नित अद्भुत इन्द्रजाल रचता है
अप्राप्य की प्रशंसा करता है
प्राप्त को कहीं और धरता है

हे मेरे मन ! 
थोड़ा रुक, थोड़ी मेरी सुन !
तू है प्रबल, प्रचण्ड, प्रखर भी
तू है विरल, तरल, अमल भी
तज ले चाहत मृगया जल की
तू छोड़ फिक्र सारी कल की
ले चल तू मुझको वहाँ उधर 
प्रभु के चरणों का धाम जिधर
संकल्प रोक! कर आवाहन!!
तू कितना दौड़ा यहाँ वहाँ
प्रभु के चरणों में हो अर्पण
थोड़ा तू बन कर देख अमन
हे मन ! तू मेरे मन !
मेरे मन ! हे मेरे मन !

रामनारायण सोनी
२२.८.२४

Wednesday, 14 August 2024

आलिंगन स्वप्नों का

आलिंगन स्वप्नों का

स्वप्न मेरे आलिंगन करके मधुमय रस भर जाते हैं
बुझती आशा की रजनी में रजत रश्मि धर जाते हैं
इनमें से कुछ कुनमुन करते, पर कुछ शोर मचाते हैं
कुछ अलसाये और उनींदे सर गोदी रख सो जाते है

कुछ में है उल्लास अपरिमित, पर कुछ हैं सहमे सहमे
कुछ मदिरा से मदिर मदिर तो कुछ रमते अन्तःपुर में
कुछ गर्वीले कुछ चटकीले, कानाफूसी सी करते कुछ 
कुछ वीणा के बुझे तार से, कुछ गाते पंचम सुर में

उनमें से कुछ स्वप्न सलोने, थोड़े से रह गये अलोने
पर चाहे जो कुछ भी होवे ये सपने मेरे अपने हैं
इनके आलिंगन में मैं तो पल पल पुलकित होता हूँ
सुख में दुःख में विरह मिलन में चिर संगी सपने हैं

रामनारायण सोनी
१५.०८.२४

Sunday, 11 August 2024

भूमिका स्वप्नों के आलिंगन में

"स्वप्नों के आलिंगन में"

"हम सृष्टि का बाह्य और आन्तरिक सौंदर्य अनुभव करें!" 
समस्त सृष्टि की जड़ और चेतन में परमात्म-सत्ता की चेतना विद्यमान है लेकिन यदि हमारी दृष्टि उसके स्थूल स्वरूप तक सीमित रहेगी तो उसमें निहित सूक्ष्म संवेदना के भाव तिरोहित नहीं हो सकते। वस्तुतः यदि प्रकृति में परमात्मा की और परमात्मा का प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त होना हमें परिलक्षित हो सके तो ही हम उसकी समग्रता और परिपूर्णता का अनुभव कर सकते हैं। इसी तरह के भाव जब जब मेरे मन में सघन हुए तब तब मुझे प्रकृति के उस बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उसमें परम सत्ता की चेतना का आभास हुआ। मुझे उसके इस नैसर्गिक सृजन में उसी का सहज रूप प्रतिबिम्बित हुआ सा लगा। हमारी दृष्टि प्रकृति का जो स्वरूप स्पष्ट रूप में देखती है उसे ही वह सत्य मान लेती है लेकिन उसके स्थूल स्वरूप से परे देखना एक प्रकार का स्वप्न ही है। इसके बावजूद मैं शायद इस तरह के स्वप्न के आलिंगन में पड़ गया और कुछ अकिंचन सी कविताएँ मेरे मानस पर उतरी वे यहाँ संग्रहित है। 
इन रचनाओं में पाठकों को संभवतः कहीं-कहीं रूढ़ियों और नियमबद्धता का अतिक्रमण हुआ लगेगा लेकिन ये रचनाएँ अत्यन्त सहजता में सामान्य रूप में आरेखित हुई है। इनमें नारी का विशुद्ध प्रेयसी के स्वरूप में ही उसकी पावनता के साथ उसके नैसर्गिक स्वरूप और लालित्य को ग्रहण किया है। मैं मानता हूँ कि नारी और प्रकृति केवल भौतिक सौंदर्य की स्वामिनी ही नहीं है वरन उसकी संचेतना अलौकिक आनन्द का स्रोत है जो केवल अनुभूति का विषय है। 
मुझे महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की कृति  'स्वर्णधूलि' की रचना 'स्वप्न बंधन' की ये पंक्तियाँ याद आती है जो मेरी इस सम्पूर्ण कृति के भावपक्ष में रंजित है। इसीलिये प्रस्तुत कृति का नामकरण भी इसी से उद्भूत है।
"बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में
एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में!
बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में!"

आशा करता हूँ कि कृति को सुधि पाठकों का स्नेहाशीष कृति को अवश्य मिलेगा।

रामनारायण सोनी
४.७.२४


Saturday, 3 August 2024

प्यास अधरों पर धरूँगा

प्यास अधरों पर

स्वाँस के मृदु तन्तु टूटे
भाव के सब बन्ध टूटे
रट रहा फिर भी पपीहा
स्वॉंति के अनुबन्ध खूटे
जुगनुओं से रोशनी की अर्चना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

पुष्प हैं निस्पन्द सारे
मौन क्यूँ हैं सब दिशाएँ
भीत मन के द्वार आ कर
कँप रही हैं क्यूँ शिराएँ
नेह के इस मेघ से जल-याचना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

सूखती सी वर्तिका ले
दीप क्या यह जल सकेगा
क्या सुलगती सीपियों में
आस का मोती पलेगा
हो मलय मधुवात मन में प्रार्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

हैं प्रबल लहरें उदधि की
और तरणी क्षीण सी है
रौंदती मन को व्यथाएँ
चेतना कुछ लीन सी है
प्राण की वंशी बजे यह अभ्यर्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

रामनारायण सोनी
३.८.२४

विपुल वेदना

विपुल वेदना

मैंने खारापन सोखा है, 
तुमको मृदु जल सींचा है
अर्णव के अतुलित बल से
लड़ कर जीवन खींचा है

स्वर्ण धूलि नभ में बिखरी
सूरज का आतप सह सह कर
छाँह मिले शीतल तुमको 
सहा सभी मैंने तप कर 

मेरे सपने कुछ बोल गए
अन्तर में पीड़ा घोल गए
नीरव रजनी की पलकों में
क्यों विपुल वेदना घोल गए

तुम अदृश्य हो दृश्यमान
उतरे ले सस्मित महारास
मेघों के उड़ते चीरों पर
अंकित करते प्रिय प्रवास

वीणा के विह्वल तारों में
मधुरव के स्वर मौन पड़े 
जीवन की इस कलिका में
कितने कितने प्रतिमान गढ़े

निर्वाणों के वे पथ अनन्त
काली रजनी की है अलकें
लुढ़क लुढ़क जाती मेरी
भारित है मन की पलकें

महाशून्य के पार क्षितिज 
सीमा अवरेख हुई जाती
कोमल किसलय कलिकाएँ
ऐसे में कैसे मुस्क्याती?

श्यामल नीरद की छलनाएँ
गलित हृदय में कौंध रही
इन अरुण नयन में अश्रु भरे
देखो तुमको ही खोज रही

रामनारायण सोनी
२७.७.२४