हे मेरे मन !
हे मेरे मन !
तू लालायित ही रहता है सदैव
अनदेखा देखने को
अनसुना सुनने को
अनछुआ छूने को
पा नहीं सका उसे पाने को
हे मेरे चंचल मन !
अविश्वसनीय पर विश्वास करता है
विश्वसनीय का उपहास करता है
अकल्पनीय का अजब गजब
नित अद्भुत इन्द्रजाल रचता है
अप्राप्य की प्रशंसा करता है
प्राप्त को कहीं और धरता है
हे मेरे मन !
थोड़ा रुक, थोड़ी मेरी सुन !
तू है प्रबल, प्रचण्ड, प्रखर भी
तू है विरल, तरल, अमल भी
तज ले चाहत मृगया जल की
तू छोड़ फिक्र सारी कल की
ले चल तू मुझको वहाँ उधर
प्रभु के चरणों का धाम जिधर
संकल्प रोक! कर आवाहन!!
तू कितना दौड़ा यहाँ वहाँ
प्रभु के चरणों में हो अर्पण
थोड़ा तू बन कर देख अमन
हे मन ! तू मेरे मन !
मेरे मन ! हे मेरे मन !
रामनारायण सोनी
२२.८.२४