विष पायी मीरा
वाणी विष-पायी मीरा की
कैसे अमृत की धार बनी
गीतों में, छन्दों, भावों में
कैसे जन जन का गान बनी
उस अनन्य के आश्रय में
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
विश्वास मेरु सा दृढ़ स्थिर
गीतों में कृष्ण उतर आया
इकतारे का तार तुन-तुना
उसमें घनश्याम उभर आया
चिर-विश्रान्ति-निलय में
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
सुधि के पल पुलकित हैं
प्राण में उत्सव रंजित है
जहाँ छाया भी लगती 'श्याम'
यही छबि उर में अंकित है
हार की ही अन्तिम विजय
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
रामनारायण सोनी
१३.२.२५
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