Wednesday, 25 December 2024

योगिनी हो कर खड़ी है

तुम हृदय की वेदना संचेतना
कोकिला की कूक सी प्रतिवेदना
स्वाँति के घन में धधकती प्यास ले
रट रहा फिर भी पपीहा अनमना
        चिर पिपासा इन अधर की
        बंदिनी हो कर खड़ी है

हैं लता के पाश में वह मौन तरुवर
खंजनों के नैन हों जैसी रुचिर
मेघना में तड़ित छबि का हास ले
वह कौमुदी के अंक में बंदी भ्रमर 
         चिर प्रतीक्षा प्रिय मिलन की
         मानिनी मन में बड़ी है

यामिनी जो ज्योत्सना का पान करती
स्वाँस में प्रस्वाँस में अनुबन्ध करती
चिर विरह की आग चकवी सह रही
अस्त हो जा चाँद, केवल आस करती
          चिर प्रभंजन इस जलन की 
          योगिनी हो कर खड़ी है

रामनारायण सोनी
२५.१२.२४

Friday, 13 December 2024

ये विकल नयन

ये विकल नयन

जो हृदय चाहता था कहना 
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया

सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी

मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं की वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल

महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा

सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है

सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले

अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों के भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं

गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े

सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ 
ना शीत निशा से बच पाई

रामनारायण सोनी
१२.१२.२४


संशोधित

Wednesday, 11 December 2024

ये विकल नयन

ये विकल नयन

जो हृदय चाहता कहना है
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया

सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी

मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल

महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा

सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है

सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले

अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं

गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े

सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ
ना शीत निशा से बच पाई

रामनारायण सोनी
१२.१२.२४

Thursday, 12 September 2024

नयन नीर से भरे भरे

नयन नीर से भरे भरे

ये नयन नीर से भरे भरे
करुणा की छाया शीश धरे
हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके
तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके

धोते निज का नित खारा पन
उस मग में चिर करते नर्तन
अब सहज नहीं है सह पाना 
कोरों से अंजन बह जाना

प्रिय मिलन विरह के कूलों की 
द्वन्द्वो में मूर्छित फूलों की
सौरभ पी भटका पवन कहीं 
अणु अणु ने अपनी व्यथा कही

ना प्रिय प्रवास से लौट सका
चिर पीर स्वयं की धो न सका
तम की छलनाएँ छलती हैं
अन्तर की ज्वाल उगलती है

उस दूर क्षितिज की सीमा के
उस पार निठुर सी गरिमा के
प्रियतम का न्यारा नगर वहाँ
चिर सजल नयन की पीर यहाँ

इनके जलप्लावन धुँधलाते
कोरों पर आकर थक जाते
मृदुहास छद्म सा नयनों में
चिर आस प्रीत की अयनों में

ये नयन नीर से भरे भरे
कब तक पीड़ा के घूँट भरे
या तो तुम ही अब आ जाओ
या अपने संग लिवा जाओ

रामनारायण सोनी
१३.०९.२४

Thursday, 22 August 2024

हे मेरे मन!


हे मेरे मन !

हे मेरे मन !
तू लालायित ही रहता है सदैव
अनदेखा देखने को
अनसुना सुनने को
अनछुआ छूने को
पा नहीं सका उसे पाने को
हे मेरे चंचल मन !
अविश्वसनीय पर विश्वास करता है
विश्वसनीय का उपहास करता है
अकल्पनीय का अजब गजब 
नित अद्भुत इन्द्रजाल रचता है
अप्राप्य की प्रशंसा करता है
प्राप्त को कहीं और धरता है

हे मेरे मन ! 
थोड़ा रुक, थोड़ी मेरी सुन !
तू है प्रबल, प्रचण्ड, प्रखर भी
तू है विरल, तरल, अमल भी
तज ले चाहत मृगया जल की
तू छोड़ फिक्र सारी कल की
ले चल तू मुझको वहाँ उधर 
प्रभु के चरणों का धाम जिधर
संकल्प रोक! कर आवाहन!!
तू कितना दौड़ा यहाँ वहाँ
प्रभु के चरणों में हो अर्पण
थोड़ा तू बन कर देख अमन
हे मन ! तू मेरे मन !
मेरे मन ! हे मेरे मन !

रामनारायण सोनी
२२.८.२४

Wednesday, 14 August 2024

आलिंगन स्वप्नों का

आलिंगन स्वप्नों का

स्वप्न मेरे आलिंगन करके मधुमय रस भर जाते हैं
बुझती आशा की रजनी में रजत रश्मि धर जाते हैं
इनमें से कुछ कुनमुन करते, पर कुछ शोर मचाते हैं
कुछ अलसाये और उनींदे सर गोदी रख सो जाते है

कुछ में है उल्लास अपरिमित, पर कुछ हैं सहमे सहमे
कुछ मदिरा से मदिर मदिर तो कुछ रमते अन्तःपुर में
कुछ गर्वीले कुछ चटकीले, कानाफूसी सी करते कुछ 
कुछ वीणा के बुझे तार से, कुछ गाते पंचम सुर में

उनमें से कुछ स्वप्न सलोने, थोड़े से रह गये अलोने
पर चाहे जो कुछ भी होवे ये सपने मेरे अपने हैं
इनके आलिंगन में मैं तो पल पल पुलकित होता हूँ
सुख में दुःख में विरह मिलन में चिर संगी सपने हैं

रामनारायण सोनी
१५.०८.२४

Sunday, 11 August 2024

भूमिका स्वप्नों के आलिंगन में

"स्वप्नों के आलिंगन में"

"हम सृष्टि का बाह्य और आन्तरिक सौंदर्य अनुभव करें!" 
समस्त सृष्टि की जड़ और चेतन में परमात्म-सत्ता की चेतना विद्यमान है लेकिन यदि हमारी दृष्टि उसके स्थूल स्वरूप तक सीमित रहेगी तो उसमें निहित सूक्ष्म संवेदना के भाव तिरोहित नहीं हो सकते। वस्तुतः यदि प्रकृति में परमात्मा की और परमात्मा का प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त होना हमें परिलक्षित हो सके तो ही हम उसकी समग्रता और परिपूर्णता का अनुभव कर सकते हैं। इसी तरह के भाव जब जब मेरे मन में सघन हुए तब तब मुझे प्रकृति के उस बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उसमें परम सत्ता की चेतना का आभास हुआ। मुझे उसके इस नैसर्गिक सृजन में उसी का सहज रूप प्रतिबिम्बित हुआ सा लगा। हमारी दृष्टि प्रकृति का जो स्वरूप स्पष्ट रूप में देखती है उसे ही वह सत्य मान लेती है लेकिन उसके स्थूल स्वरूप से परे देखना एक प्रकार का स्वप्न ही है। इसके बावजूद मैं शायद इस तरह के स्वप्न के आलिंगन में पड़ गया और कुछ अकिंचन सी कविताएँ मेरे मानस पर उतरी वे यहाँ संग्रहित है। 
इन रचनाओं में पाठकों को संभवतः कहीं-कहीं रूढ़ियों और नियमबद्धता का अतिक्रमण हुआ लगेगा लेकिन ये रचनाएँ अत्यन्त सहजता में सामान्य रूप में आरेखित हुई है। इनमें नारी का विशुद्ध प्रेयसी के स्वरूप में ही उसकी पावनता के साथ उसके नैसर्गिक स्वरूप और लालित्य को ग्रहण किया है। मैं मानता हूँ कि नारी और प्रकृति केवल भौतिक सौंदर्य की स्वामिनी ही नहीं है वरन उसकी संचेतना अलौकिक आनन्द का स्रोत है जो केवल अनुभूति का विषय है। 
मुझे महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की कृति  'स्वर्णधूलि' की रचना 'स्वप्न बंधन' की ये पंक्तियाँ याद आती है जो मेरी इस सम्पूर्ण कृति के भावपक्ष में रंजित है। इसीलिये प्रस्तुत कृति का नामकरण भी इसी से उद्भूत है।
"बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में
एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में!
बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में!"

आशा करता हूँ कि कृति को सुधि पाठकों का स्नेहाशीष कृति को अवश्य मिलेगा।

रामनारायण सोनी
४.७.२४


Saturday, 3 August 2024

प्यास अधरों पर धरूँगा

प्यास अधरों पर

स्वाँस के मृदु तन्तु टूटे
भाव के सब बन्ध टूटे
रट रहा फिर भी पपीहा
स्वॉंति के अनुबन्ध खूटे
जुगनुओं से रोशनी की अर्चना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

पुष्प हैं निस्पन्द सारे
मौन क्यूँ हैं सब दिशाएँ
भीत मन के द्वार आ कर
कँप रही हैं क्यूँ शिराएँ
नेह के इस मेघ से जल-याचना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

सूखती सी वर्तिका ले
दीप क्या यह जल सकेगा
क्या सुलगती सीपियों में
आस का मोती पलेगा
हो मलय मधुवात मन में प्रार्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

हैं प्रबल लहरें उदधि की
और तरणी क्षीण सी है
रौंदती मन को व्यथाएँ
चेतना कुछ लीन सी है
प्राण की वंशी बजे यह अभ्यर्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

रामनारायण सोनी
३.८.२४

विपुल वेदना

विपुल वेदना

मैंने खारापन सोखा है, 
तुमको मृदु जल सींचा है
अर्णव के अतुलित बल से
लड़ कर जीवन खींचा है

स्वर्ण धूलि नभ में बिखरी
सूरज का आतप सह सह कर
छाँह मिले शीतल तुमको 
सहा सभी मैंने तप कर 

मेरे सपने कुछ बोल गए
अन्तर में पीड़ा घोल गए
नीरव रजनी की पलकों में
क्यों विपुल वेदना घोल गए

तुम अदृश्य हो दृश्यमान
उतरे ले सस्मित महारास
मेघों के उड़ते चीरों पर
अंकित करते प्रिय प्रवास

वीणा के विह्वल तारों में
मधुरव के स्वर मौन पड़े 
जीवन की इस कलिका में
कितने कितने प्रतिमान गढ़े

निर्वाणों के वे पथ अनन्त
काली रजनी की है अलकें
लुढ़क लुढ़क जाती मेरी
भारित है मन की पलकें

महाशून्य के पार क्षितिज 
सीमा अवरेख हुई जाती
कोमल किसलय कलिकाएँ
ऐसे में कैसे मुस्क्याती?

श्यामल नीरद की छलनाएँ
गलित हृदय में कौंध रही
इन अरुण नयन में अश्रु भरे
देखो तुमको ही खोज रही

रामनारायण सोनी
२७.७.२४

Wednesday, 17 July 2024

सत्य प्रेम करुणा


सत्य-प्रेम-करुणा

केवल सत्य ही सत्य है,
केवल सत्य ही नित्य है
सत्य शिव है, सत्य सुन्दर है

प्रेम प्यास है और प्रेम ही तृप्ति है
प्रेम पदुमराग है और प्रेम ही अनुरक्ति है
प्रेम आस भी है, प्रेम विश्वास भी है
प्रेम की पीड़ा में भी सच्चा सुख है

संवेदना के सागर की तलहटी में
जब करुणा के बीज उगेंगे
तब प्रेम का कमल प्रस्फुटित होगा

        रामनारायण सोनी
          १८.०७.२४

Wednesday, 19 June 2024

छोटी सी बड़ी जिन्दगी

छोटी सी बड़ी जिन्दगी

गुलाब के फूल ने 
एक दिन लिखी अपनी 
एक छोटी सी बड़ी जिन्दगी
...तब जब मैं काँटों के बीच
उगा था एक नन्हीं सी कली बन कर
सेपल से ढँकी सुरक्षित थी वह
फिर यह घेरा हटा और 
अपनी पंखुड़ियों के डैने फैलाये
मुस्का कर मैंने 
सूरज से आँख मिलाई
यह थी मेरी उत्सवी तरुणाई
मेरे उदर में जुड़ गया था
खुशबुओं का अनोखा संसार
जी भर कर लुटायी मैंने
सौरभ और सौंदर्य
मैं हाजिर था 
किसी देव प्रतिमा पर चढ़ने को
किसी रमणी के जूड़े में सजने को
किसी की सेज पर बिखरने को
किसी की अर्थी पर समर्पित होने को
या फिर नदी की धारा में
बिखेर कर अपनी पंखुड़ियों को
उसमें तिनके सा बहने को
देखो!
कब जिया जिन्दगी
मैं अपने लिये
मैं मुझे नही सही
तुम्हें जरूर याद आऊँगा।

रामनारायण सोनी
२०.६.२४

Tuesday, 28 May 2024

बूँद से मोती बनना है

बूँद से मोती बनना है 

मैं एक बूँद ही तो हूँ 
नहीं देखता मैं नदी होने का स्वप्न 
नहीं चाहता समुन्दर का सा विस्तार 
नहीं चाहता मैं उड़ना भी 
बादल बन कर स्वच्छन्द आकाश में 
शतदल के पत्तों पर बँधा बँधा मैं 
हो तो सकता हूँ खूबसूरत
पर डरता हूँ सूरज की तपन से,
नहीं बुझाना चाहता प्यास पपीहे की 
मैं बस सीप के गर्भ में पलना चाहता हूँ 
जहाँ खो सकूँ अपनी विरलता 
चाहता हूँ उसी सीपी के गर्भ में 
मेरी साधना मौन की साधना हो जावे।
जब खुलें सीपी के अन्तर्पट 
चाहता हूँ मैं मोती बन जाऊँ

रामनारायण सोनी
५.१.२४

Saturday, 4 May 2024

हे उषे !

हे उषे!
तुम तमस के गर्भ से हो सद्यजात सुलक्षणी
प्रति दिवस के प्रात में नवआलोक की प्रकर्षिणी
स्वर्णमय आकाश की तुम स्वामिनी हो मृण्मयी
सुप्त जग में हो उतरती ले चेतना उद्धर्षिणी।।

अंग में प्रत्यंग में है कान्ति अरुणिम लस रही
स्वर्ग से अपवर्ग तक  मधुमत्तमा सी बह रही
हे उषे! भर दो प्रखर प्रज्ञान इस क्षिप्त मन में
तुम प्रणव के नाद का जयघोष ही तो कर रही

हे उषे! शुभ हो तुम्हारा आगमन जग के लिये
स्वामिनी ऋत की तुम्ही हम सोम इसमें ही पियें
है तुम्हारी सौम्य चितवन प्राण की आह्लादिनी
हों सुखी संसार यह जग, हों निरुज हम सब जियें

हैं सभी ये पंथ ज्योतित बस तेरे अधिमान ही से 
है छलकती ज्योति प्रातः स्वर्णघट आधान ही से
तुम विदा होती हो तब फिर लौटने को कल सुबह
अब प्रकाशित जग रहेगा दिवस यह दिनमान ही से

धेनुएँ रक्तिम जुती हैं, है दौड़ता यह रथ तुम्हारा
रश्मियों ने रंग दिया है चित्रपट सा नभ हमारा
सब दिशाएँ, वीथियाँ सब, स्वर्ण की सी धूलि मय 
वन्दना करती प्रकृति भी 
है प्रकृति भी कर रही ले थाल ये अर्चन तुम्हारा

वेद ने 'दुहितर्दिवः' कह नाम पावन सा दिया है
सत्य, ऋत के पथ चली तप कठिन तुमने किया है
भेद कर भीषण तिमिर को ज्योति की ले कर पताका
ज्ञान जनगण मन में भर उपकार तुमने किया है

तुम उतरती द्युलोक से रोज इस प्यारे जगत में 
तुम जगाती सुप्त से देवांश मानव में प्रगत में
तुम सुनाती हो अरुण के अश्व की पदचाप सुमधुर
जब उदय होता है रवि नित प्रात में इस जगत में






वैदिक ऋषि उषा से पूछता है कि 'हे सुन्दरि! तुम द्युलोक से चल कर यहाँ इतने नीचे उतर कर क्यों आती हो?' उषा प्रत्युत्तर देती है कि 'मैं यहाँ अमृतपुत्रों से मिलने के लिये आती हूँ। मैं उन पर आशीषों का समन्दर लुटाने के लिये आती हूँ। मैं धरती पर वैसा ही प्रकाश उगाने आती हूँ, जैसा कभी मैंने सुदूर अतीत में उगाया था।'

ऋग्वेद के पाँचवें मंडल के एक उषा सूक्त की पहली ऋचा को देखें। 'द्युतद्यामानं बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणप्सुं विभातीम्। देवीमुषसं स्वरावहन्तीं प्रति विप्रासो मतिभिर्जरन्ते।।'इस ऋचा का भाव देखिए। 'हे उषासुन्दरि ! देवलोक का स्वर्णिम प्रकाश लेकर तू पृथ्वी पर उतर। जन-जन की चेतना में सुप्त देवांशों को जागृत कर दे। सूर्य के जन्म का यह पर्व फिर द्वार पर खड़ा है। हे सुजाते! तेरी मधुर वाणी में दिव्य अश्वों के पदचाप ध्वनित हैं।' इस ऋचा में द्युलोक की सुकन्या से कितनी सुंदर प्रार्थना की गई है। ऋषि उषा से जन-जन में सुप्त देवांशों को जगाने के लिये निवेदन कर रहा है। यह सम्पूर्ण पृथ्वी सूर्य के जन्म का उत्सव मनाने की तैयारी कर रही है, और उषा की मधुर वाणी में दिव्य अश्वों की पदचाप सुनाई दे रही है।

वैदिक ऋषि उषा को कभी सुजाता कहता है, कभी विभावरी कहता है, कभी दिव्य तनया, और कभी स्वर्गकन्या। उसका स्वरूप कुछ ऐसा है कि वह वसुओं से भरे हुए रथ पर आरूढ है। उसकी वंदना में अग्नशिखाएँ ऊपर तक उठ रही हैं। उसके उपहारों से विश्व का प्रांगण भर गया है। उसके आलोक के महारास में देवपुत्र झूम रहे हैं। पृथ्वी पर आनंद का प्रसाद बँट रहा है। पवित्र अभीप्साएँ चारों दिशाओं में फैल रही हैं।

उषा हमें ऐश्वर्यों की महादेवी दिखाई देती हैं। वैदिक ऋषियों ने उषा का जो वर्णन किया है, उसके अनुसार वह सूरियों में वीरता के तेज का संचार कर देती है। उसकी धवल दीप्ति और उज्ज्वल यश ही हमें आनंद के विस्तार में ले चलता है। वह अमर प्रकाश की प्रेरणाएँ और उज्ज्वल ज्योति के पवित्र कण लेकर हमें जगाने के लिये दौड़ी चली आती है। उसके आने के साथ ही हमारा साहस फिर से जाग उठता है।

उषा केवल ज्योति की देवी या स्वर्गकन्या ही नहीं है, वह वैदिक ऋषियों की सबसे सुंदर कविता भी है। ऋषियों का  उद्गाता मन जब भी सुरभारती के अनुग्रह से काव्यमय होता है, तो वह उषा के सौन्दर्य में अवगाहन करता हुआ मनोरम पदबंध रचने लगता है। उषा को निवेदित जितनी भी ऋचाएँ हैं, वे हमें उत्साह और उमंग से भर देती हैं। इन ऋचाओं में वह ऊर्जा है, जो हमें प्रकाश की तरंगों के सहारे-सहारे द्युलोक तक की सैर कराने में समर्थ है।

🍁मुरलीधर

Sunday, 21 April 2024

सपन सलोने बचपन के

सपन सलोने बचपन के

बचपन के सपन सलोने जो
गुड्डे गुड़िया के अपने जो
बैठे बैठे ही उड़ते थे
अनबोलेपन में कुढ़ते थे

खुद को उनमें हम खोते थे
सिरहाने ले कर सोते थे
कुछ मेरे थे, कुछ उसके थे
गुत्थमगुत्था हो सिसके थे

फिर इक दिन ऐसा भी आया
फिर वक्त बहेलिया बन छाया
सपने फँस कर उन जालों में
टूटे बिखरे सब ख्यालों में

थे सपन कपूर के बने हुए 
जाने कब, सब काफूर हुए
वे दिन थे कितने सोने के
थे प्रेम बीज कुछ बोने के

सपनों पर सब कुछ वारा
सपनों की मधुमय रसधारा 
जीता करती वो सदा सदा, 
हर खेल सदा मैं ही हारा

इसकी तो थी आदत मेरी, 
उसकी हर जिद होती पूरी
फिर भी बस मैं तो मैं ही था
इस रिश्ते की महकी कस्तूरी

सब से न्यारी बस वह थी, 
था मुट्ठी में आकाश भरा
मन के शहदी मधुबन में
जब जी चाहा मधुमास झरा

बिना पंख हम उड़ते फिरते
छुटका सा था संसार हमारा
पर जो था, जैसा भी था वह
कितना न्यारा, कितना प्यारा 

हम समझे थे ...
धरती तो एक गोला है
हाथों पर उगा फफोला है
फिर से कहीं मिलेंगे सब
पर बीत न पाई काली शब

हमने चुटकी में वो खोया
जो बचपन भर हमने पोया
ढूँढा मस्तक की लेखा में
टूटे तारों की रेखा में

ना गुड्डा था, ना गुड़िया थी
जो आफत की इक पुड़िया थी
इक दिन भूले भटके में
टूटे दर के उस खटके में

चुन्नी गुड़िया की उलझी पाई 
जो दीदी से थी सिलवाई 
अब केवल वही..
बस केवल वही....
हाँ! केवल वही गवाही है,
हाँ! केवल उसे छुपाई है

यादों की बड़ी तिजोरी में
किस्मत की बरजोरी में।
मेरा सब कुछ तुम ले लो
सपनों से कोई मत खेलो

पर, किस्मत में यही बदा है
अपने काँटो से फूल छिदा है
गुड़िया का काजल रहने दो
उसके कानों में सब कहने दो

वरना वे बोल अबोले ही 
इस मिट्टी संग जल जायेंगे
शायद ये सब जल कर ही
उन रूमानी सपनों में
जा कर फिर मिल जायेंगे।

रब से है यह बड़ी शिकायत 
क्यों फिर ऐसी पड़ी रवायत
जो सपन बने, बने फिर बिखरे
हुण्डी यह तो है वो ही, 
भूले से भी जो ना शिकरे

क्यों रच डाला मधुर मेल?
अगर टूटना!, तय था खेल
जो मिला नहीं, वह खोया ही है
भाग जगा इक पल को, फिर सोया ही है

तुम क्या समझे ? 
क्या यह केवल मेरे ही संग घटा है?
नहीं नहीं! सब ओर बँटा है

तुम! 
तुम!! 
और हाँ, तुम भी!
इसी तरह से कहीं कभी, 
हर सक्ष लुटा है
बिखरा बादल नीले नभ में
फिर से क्या वह कभी जुटा है?

अब ढूँढ सको तो ढूँढो, मुझको मुझमें,
खोया कब से मैं ही मुझमें
सपने और सपनों के मेले
निठुर वक्त ने सदा धकेले

बचे न वे डेरे ना तंबू, 
ना खूँटे और न वे बंबू
तू बंजारन, मैं बंजारा
चल तू जीती, ले मैं हारा
चल तू जीती, ले मैं हारा

रामनारायण सोनी
२२ ४ २४

Friday, 12 April 2024

मिली ही कहाँ?

मिली ही कहाँ ?


आँख में आँख उलझी जहाँ थी वहाँ

सारी बिसरी थी सुधियाँ वहाँ की वहाँ

फिर न लौटे वे पल ही कभी आज तक

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


धड़कनों संग धड़कन धड़कती रही

मन के पावों की पायल खनकती रही

बस वो तुम थी वहाँ, और मैं था वहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


दीप जलता रहा देख कर यूँ हमें

पाँव पल के अचानक वहाँ थे थमे

होंश में होश को, होंश था ना वहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


तब से दिल की न दर की कुण्डी बजी

कोई प्यार की ना ही महफिल सजी

आम पर मंजरी है, वो कोयल कहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


हैं वो लमहे जिगर में अभी जो धरे 

हैं पलकों की कोरों में आँसू भरे 

है सिवा तेरे कोई जँचा ही कहाँ ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


उम्र जाती रही आँख पथरा गई

आस बोझिल हुई, और गहरा गई 

अब पता ही कहाँ, मैं कहाँ ? तुम कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


बरसों बरस बाद फिर तुम मिली

उत्सवी हो गई मन की हर इक गली

आज उतरे जमीं पे हैं दोनों जहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


अनगिनत प्रश्न अन्तर में तैरे मगर

दो जुड़े उन दृगों में वो संवाद गूँजे

ये तन थे यहाँ पर, वे मन थे कहाँ

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?

तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?


रामनारायण सोनी

१२.०४.२४