Wednesday, 19 February 2025

तुम अनन्त के राही हो

तुम अनन्त के राही हो

यह जीवन-पथ है शूल भरा
यह शापित अम्बर धूल भरा
पद पद पर दुर्दम बाधाएँ
हर दिश से आती छलनाएँ
      सम्हलो ! अनन्त के राही तुम
      ऐसे क्षण नहीं सदा होंगे

ऋतु बदली वह शिशिर गया
नव अंकुर का नव जनम हुआ
भूलो रजनी के तम-घन को
खिलने दो बोझिल तन मन को
        कब पतझड़ बारह मास रहे
        इक दिन ये भी विदा होंगे

फेंको संशय के वल्कल को
देखो खिलते इन शतदल को
जग सारा एक समर - वन है
आशा इक दिव्य अमर धन है
        अपने भुज नित्य प्रलम्ब रहे
         अन्तिम फल जय-प्रदा होंगे

रामनारायण सोनी
२०.२.२५

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