गीत में बहती त्रिपथगा
अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
गीत में बहती त्रिपथगा
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
हिमशिखर का पय पिघल पावन हुआ
पाहनों का स्नेह से, निर्झरों ने तन छुआ
उत्स के, सद्धर्म के द्रव ले कर बही यह
गीत-गंगा ने समर्पित प्रीत का सागर छुआ
प्रीत की देवापगा की
इस सुधा का पान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
आदियुग से धार में है ऋत ऋचायें बह रही
चिर सनातन-संस्कृति की गूढ़ गाथा कह रही
गीत-गंगा, सदा नीरा, रव कलित कल कल
नव-रसों से शुभसृजन कर अमृता नित भर रही
संस्तुति माँ शारदे की
स्वस्ति के शुभगान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
रामनारायण सोनी
१०.०२.२५
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