उठ कर गिरूँ
संवेदना के सिंधु का मैं
बिन्दु हूँ, तप से तपा हूँ
आरोह का अभिसार ले
श्यामघन में आ छुपा हूँ
मैं उठूँ, उठ कर गिरूँ उन
कण्ठ में प्यासे पड़े जो
ताकते नभ में विकल से
आस में कब से खड़े जो
मैं उठा, उठ कर गिरा हूँ
और गिर कर, फिर उठूँगा
शुष्क वसुधा की शिरा में
तृप्ति ले फिर फिर बहूँगा
मैं गिरूँ वन प्रान्तरों में
कर सकूँ अभिषेक इनका
सृष्टि का पोषण करें, खुद
दान कर निज सम्पदा का
सिन्धु से उठ कर चलूँ
गन्तव्य फिर से सिन्धु हो
पन्थ में पाथेय नित नव
अभिसिक्त हर रज बिन्दु हो
रामनारायण सोनी
29.1.25
"सिंधु से उठना और उसी में विलीन होना तो बादल ही करते हैं प्यासी धरा को रससिक्त करने के बाद कुछ बचा तो उत्स तक जायेगा।उमड़ी कल थी मिट आज चली जैसा मामला नहीं है।"
डॉ. जया पाठक
माननीया आप आचार्य रही हैं, हैं भी, आपको उसी प्रणतभाव से प्रणाम करता हूँ। कविता तुरीय से पुनः तुरीय की यात्रा है। सिन्धु, बिन्दु, बादल, धरती, धरती के जीव उपाधियाँ अथवा साधन हैं। जल इसका आत्मतत्व है। बादल, बूँद, समुद्र इसकी अवस्थाएँ हैं। गति का स्रोत चेतना है।
असल में यह कविता एक अन्तर्बोध का प्रतिबिम्ब है। इसमें 'गिरूँ' शब्द 'पतन' का पर्याय नहीं अपितु यह कर्म के लिये आवश्यकीय क्रिया है, यात्रा है। चलना, बहना, गतिमान होना जीवन की जीवन्त प्रक्रिया है।
माण्डूक्य उपनिषद के आधार पर :-
सिंधु यहाँ आत्मा के लिये प्रतीक है। सर्व्ँह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।।१।।
हिंदी अनुवाद :
यह सब (जिसे हम नाम और रूप से जानते हैं) जगत ब्रह्म है, आत्मा ब्रह्म है, ब्रह्म या यह आत्मा चतुष्पाद (चार पैर वाला) है। (यहाँ अलंकारिक भाषा में आत्मा या ब्रह्म को चार पदों वाला बतलाया गया है)
सिंधु का तत्वबोध जल ही है। गागर में भर लो तो गागर का परन्तु तत्वबोध में जल है। भाप बनने पर वाष्प का भी तत्वबोध जल ही है। वाष्प इसी जल की उपाधि है जो सिन्धुरूपी परम कारण की ही अवस्था अर्थात् पाद है। बादल अर्थात् वाष्प का संघनित होना बूँद है। यह द्वितीय पाद अर्थात् यह तात्विक जल की ही दूसरी उपाधि है। इस बूँद का नदी, तालाब, धारा, झरना आदि बन जाना तात्विक जल की तृतीय उपाधि है। इस जल का सिंधु में लौट जाना जल के परम कारण अर्थात् सिंधु में लौट जाना आत्मा अर्थात् ब्रह्म का चतुर्थ पाद है।
धरती पर रमण करने वाला उपाधि रूप "स्थूलभुग्वैश्वानरः" है, बादल से बना बूँद "प्रविविक्तभुक्तैजसो" तैजस है। बादल जो बूँद का वाहक है तात्विक जल का "चेतोमुखः" उपाधि वाल प्राज्ञ तृतीय पाद है।
सिंधु स्वयं तात्विक जल का चतुर्थ पाद तुरीय है। वास्तव में तो यह पाद निरुपाधि है जिसे हम ओंकार (ॐ) के वाचक नाम अथवा प्रणव के नाम से जानते भर हैं। यही स्रोत है यही गन्तव्य है। जैसे आप कहीं प्रोफेसर हैं, कहीं स्त्री हैं, कहीं वक्ता है पर कार्यरूप से ये बाह्य उपाधियाँ ही हैं। कारण रूप में आप एक आत्मा हैं। तत्वमसि ॥तत् त्वं असि॥
आपने इस चिन्तन को आश्रय दिया। साधु।
यह कविता उस उपनिषद् के समग्र चिन्तन का प्रतिबिम्ब है। कोई भी इसे पढ़ कर इसके स्थूल अर्थात् वैश्विक स्तर को ही देख पायेगा। क्षमा करें। यह कोई ज्ञान नहीं मेरे अन्तर में अवस्थित बोध का प्रतिबिम्ब है, क्योंकि अनुभूतियाँ शब्दाकार नहीं हो सकती है, वह भावभूमि का निर्बीज फल है।
"निगमकल्पतरोर्गलितं फलं, शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं, मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः।।"
सादर वन्दन
रामनारायण सोनी
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