Monday, 11 September 2017

ओशो 1

पहला प्रवचन-(संसार पाठशाला है)

 पहला प्रश्न: भगवान, विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है। और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजी, और फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आप आज अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं।

भगवान, यह अनहद में बिसराम क्या है, यह हमें समझाने की कृपा करें।

 आनंद मैत्रेय!

विश्राम के लिए पक्षी घोंसला बनाए, इसमें तो कुछ भी अड़चन नहीं। क्योंकि घोंसले में किया गया विश्राम, आकाश में उड़ने की तैयारी का अंग है। आकाश से विरोध नहीं है घोंसले का। घोंसला सहयोगी है, परिपूरक है। सतत तो कोई आकाश में उड़ता नहीं रह सकता। देह तो थकेगी। देह को विश्राम की जरूरत भी पड़ेगी।

इसलिए घोंसला शुभ है, सुंदर है, सुखद है। इतना ही स्मरण रहे कि घोंसला आकाश नहीं है। सुबह उड़ जाना है; रैन बसेरा है। लक्ष्य तो आकाश ही है; घोंसला पड़ाव है। गंतव्य, मंजिल, वह तो अनंत आकाश है; वह तो सीमाओं के पार जाना है। क्योंकि जहां तक सीमा है, वहां तक दुख है; सीमा ही दुख है। सीमा में होना अर्थात कारागृह में होना। जितनी सीमाएं होंगी, उतना ही आदमी जंजीरों में होगा। सब सीमाएं टूट जाएं, तो सब जंजीरें गिर जाएं।

कारागृह से इस मुक्ति के उपाय का नाम ही धर्म है।

संसार का अर्थ है, कारागृह से चिपट जाना; कारागृह को पकड़ लेना; जंजीरों को आभूषण समझ लेना। तोड़ने की तो बात दूर, कोई तोड़े तो उसे तोड़ने न देना। सपनों को सत्य समझ लेना और रास्ते के पड़ावों को मंजिल मान कर रुक जाना। बस, संसार का इतना ही अर्थ है। संसार न तो दुकान में है, न बाजार में है; न परिवार में है, न संबंधों में है। संसार है इस भ्रांति में, जो पड़ाव को मंजिल मान लेती है। संसार है इस अज्ञान में, जो क्षण भर के विश्राम को शाश्वत आवास बना लेता है।

घोंसला बनाओ; जरूर बनाओ, सुंदर बनाओ, प्रीतिकर बनाओ। तुम्हारे सृजन की छाप हो उस पर। तुम्हारे व्यक्तित्व के हस्ताक्षर हों उस पर। फिर घोंसला हो, कि झोपड़ा हो, कि मकान हो, कि महल हो, अपनी सृजनात्मक ऊर्जा उसमें उंडेलो। मगर एक स्मरण कभी न चूके, सतत एक ज्योति बोध की भीतर जलती रहे: यह सराय है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, इसे छोड़ कर जाना है; जाना ही पड़ेगा। तो जिसे छोड़ कर जाना है, उसे पकड़ना ही क्यों? रह लो; जी लो; उपयोग कर लो। आग्रह न हो, आसक्ति न हो।

दो तरह के लोग हैं। एक हैं, जो संसार में रहते हैं और संसार में गहन आसक्ति निर्मित कर लेते हैं। दूसरे हैं, जो संसार से भाग खड़े होते हैं।

जिनको हमने सदियों तक संन्यासी कहा है, थे वे केवल भगोड़े। उन्हें हमने पूजा है; उनकी हमने अर्चना की है। उनके लिए हमने दीए जलाए, धूप बारी; उनके ऊपर हमने फूल चढ़ाए, केसर छिड़की। क्योंकि हमें लगा कि अपूर्व, अद्वितीय, असंभव कार्य उन्होंने कर दिखाया है। हमसे तो छूटता नहीं, और वे छोड़ कर चले गए!

लेकिन उनसे भी छूटा नहीं है। असल में कहीं पकड़ न जाएं, इस डर से भाग खड़े हुए हैं। छूटने में और छोड़ने में फर्क है। छूटना तो बोध की प्रक्रिया है; वह तो सम्यक जागरण है; उसकी सहज निष्पत्ति है।

दो फकीर एक जंगल में यात्रा करते थे, गुरु और शिष्य। बूढ़ा गुरु, युवा शिष्य। युवा शिष्य बहुत हैरान था! हैरान था इसलिए कि ऐसी बात उसने अपने गुरु में कभी देखी ही न थी। कुछ नई ही बात हो रही थी आज। गुरु बार-बार अपनी झोली में हाथ डाल कर कुछ टटोल लेता था। थोड़ी देर में फिर! थोड़ी देर में फिर! झोली में उसका जी अटका था। शिष्य सोचता था कि क्या झोली में है आज! उसे कभी चिंतित नहीं देखा। उसे कभी झोली में बार-बार झांकते नहीं देखा। आज क्या माजरा है!

फिर सांझ होने लगी, सूरज ढलने लगा। वे एक कुएं पर हाथ-मुंह धोने, थोड़ा विश्राम करने, थोड़ा कलेवा कर लेने को रुके। गुरु पानी भरने लगा। झोला उसने अपने शिष्य को दिया और कहा, जरा सम्हाल कर रखना!

ऐसा भी उसने कभी कहा न था। झोला यूं ही रख देता था। न मालूम कितने घाटों पर और न मालूम कितने कुओं पर रुकना हुआ था। आज क्या बात है! उत्सुकता जगी। जब गुरु पानी भरने लगा, तो शिष्य ने झांक कर झोले में देखा। सोने की एक ईंट झोले में थी! सब राज खुल गया। उसने ईंट को तो निकाल कर झोले के बाहर कुएं के पास फेंक दिया एक गङ्ढे में और उसी वजन का एक पत्थर झोले में रख दिया।

गुरु ने जल्दी से हाथ-मुंह धोया, नाश्ता किया। बीच-बीच में झोले पर नजर भी रखी। एक-दो बार चेताया भी शिष्य को कि झोले का खयाल रखना। शिष्य हंसा, उसने कहा, पूरा खयाल है; आप बिलकुल निष्फिक्र रहें। चिंता की अब कोई बात ही नहीं!

जैसे ही निपटे, चलने को आगे बढ़े, गुरु ने जल्दी से झोला वापस ले लिया। अक्सर तो यूं होता था कि झोला शिष्य को ही ढोना पड़ता था। आज गुरु शिष्य पर झोले का बोझ डालने को राजी न था! जल्दी से झोला अपने कंधे पर ले लिया। बाहर से ही टटोल कर देखा: वजन पूरा है; ईंट भीतर है। निश्चिंत हो चलने लगा।

फिर बार-बार कहने लगा, रात हुई जाती है। दूर किसी गांव का टिमटिमाता दीया भी दिखाई पड़ता नहीं! जंगल है। अंधेरा है। अमावस है। चोर, लफंगे, लुटेरे--कोई भी दुर्घटना घट सकती है। जब भी गुरु यह कहे, शिष्य हंसे।

आखिर गुरु ने दो मील चलने के बाद पूछा कि तू हंसता क्यों है?

शिष्य ने कहा, मैं इसलिए हंसता हूं कि अब आप बिलकुल निश्चिंत हो जाएं। आपकी चिंता का कारण तो मैं कुएं के पास ही फेंक आया हूं।

तब घबड़ा कर गुरु ने झोले में हाथ डाला। देखा तो पत्थर था! सोने की ईंट तो जा चुकी थी! क्षण भर को तो सदमा लगा। छाती की धक-धक रुक गई होगी। श्वास ठहरी की ठहरी रह गई होगी। लेकिन फिर बोध भी हुआ। बोध यह हुआ कि दो मील तक झोले में तो पत्थर था, लेकिन मैं यूं मान कर चलता रहा कि सोने की ईंट है, तो मोह बना रहा। जिंदगी भर भी अगर मैं यह मान कर चलता रहता कि सोने की ईंट है, तो मोह बना रहता। मोह ईंट में नहीं था, मेरी भ्रांति में था। मोह ईंट में होता, तो इन दो मीलों तक मोह के होने का कोई कारण न था; चिंता की कोई वजह न थी। मेरी आसक्ति मेरे भीतर थी, बाहर की ईंट में नहीं। जिंदगी भर भी आसक्त रह सकता था, अगर यह भ्रांति बनी रहती कि ईंट सोने की है। और तत्क्षण भ्रांति टूट गई, जैसे ही जाना कि ईंट पत्थर की है।

झोला वहीं गिरा दिया। खिलखिला कर हंसा। वहीं बैठ रहा। कहा, अब कहां जाना है? अब गांव वगैरह खोजने की कोई जरूरत नहीं। वैसे ही बहुत थके हैं। अब आज रात इसी वृक्ष के नीचे सो रहेंगे।

शिष्य ने कहा, अंधेरा है! अमावस है! चोर हैं, लुच्चे हैं, लफंगे हैं, लुटेरे हैं!

गुरु ने कहा, रहने दे। अब कुछ भेद नहीं पड़ता। अब अपने पास ईंट ही नहीं, अपने पास सोना ही नहीं, तो लूटने वाला भी क्या लूटेगा!

इसे मैं छूटना कहता हूं। छोड़ा नहीं, छूटा। एक बोध जगा। एक समझ गहरी हुई। एक बात साफ हो गई कि सब उपद्रव भीतर है, बाहर नहीं। बाहर तो सिर्फ बहाने हैं, निमित्त, खूंटियां, जिन पर हम अपने भीतर के उपद्रव टांग देते हैं। फिर धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, परिवार हो, प्रियजन हों, मित्र हों, देह हो, मन हो--कोई भी बहाना काम दे देगा। लेकिन अगर भीतर टांगने को ही कुछ न बचा हो, तो फिर सब बहाने रहे आएं, क्या फर्क पड़ता है! फिर बाजार में बैठो कि मरघट में, बराबर है।

वे जो भगोड़े हैं, उनसे संसार छूटा नहीं है; उन्होंने छोड़ा है। और दोनों शब्दों में उतना ही भेद है, जितना जमीन और आसमान में। छूटना तो बोध से होता है; छोड़ना भय से होता है। भय और बोध का क्या नाता? क्या संबंध? वे तो विपरीत हैं; उनका तो कभी मिलन होता ही नहीं। बोध और भय? भय तो पलता है अंधेरे में। और बोध जगता है उजेले में। बोध है सुबह; और भय है अमावस की रात। दोनों का कैसा मिलन?

वे जो भाग गए हैं छोड़ कर, छिप गए हैं जाकर पहाड़ियों में, गुफाओं में, वे सिर्फ भयभीत हैं, डरे हुए हैं। डर है कि संसार में अगर रहे, तो आसक्ति पकड़ लेगी।

मगर संसार ने कभी किसी को पकड़ा है? तुम कल न मरो,आज मर जाओ, तो संसार तुम्हें क्षण भर न रोकेगा--कि न जाओ; कि ठहरो; कि कुछ देर तो ठहरो! तुम्हारे बिना कैसे चलूंगा! कि तुम्हारे अभाव में, तुम्हारे बिना सब अस्तव्यस्त हो जाएगा, अराजकता हो जाएगी। तुम नहीं, तो फिर जिंदगी कहां! रुक जाओ, ठहर जाओ! थोड़ी देर और। जरा सम्हल लेने दो; परिपूरक खोज लेने दो; फिर चले जाना। ऐसी जल्दी क्या है?

कल के मरते आज मर जाओ, संसार को क्या पड़ी है! कुछ अंतर ही नहीं पड़ता। कितने लोग आए, कितने लोग गए! कितने लोग आते रहे, जाते रहे! कितने लोग आते रहेंगे, जाते रहेंगे! संसार अपनी जगह है। संसार तुम्हें पकड़ता नहीं। तुम संसार को पकड़े हुए हो।

इसलिए छोड़ कर कहां भाग रहे हो? अगर पकड़ने की आदत तुम्हारी है, तो तुम्हारे साथ चली जाएगी। उसे कैसे छोड़ोगे? वह तो भीतर है। तो हो सकता है, महल छोड़ दो; झोपड़ा पकड़ लोगे। सिंहासन छोड़ दो; लंगोटी पकड़ लोगे। तिजोरियां छोड़ दो, भिक्षापात्र पकड़ लोगे। राज्य छोड़ दो, कुछ अंतर न पड़ेगा, एक वृक्ष के नीचे बैठ रहोगे, उस पर कब्जा कर लोगे कि यह मेरा वृक्ष! इसके नीचे कोई और अड्डा न जमाए! किसी और की धूनी न लगे! पकड़ोगे तुम जरूर। क्योंकि पकड़ कहीं यूं जाती है! पकड़ तो केवल समझ से जाती है।

इसलिए मैं अपने संन्यासी को कहता हूं, भागना मत। भागना है भय। और भय तो कायरता है। और कायर तो संसार भी नहीं पा सकता, सत्य को क्या खाक पाएगा! इसलिए मेरे मन में भगोड़ों के प्रति कोई आदर नहीं, कोई सम्मान नहीं। वे चाहे कितने ही बड़े भगोड़े रहे हों, और चाहे उन्होंने कितने ही लोगों को प्रभावित कर दिया हो।

लोग तो अपने से विपरीत व्यक्ति से प्रभावित हो जाते हैं। एक आदमी सिर के बल खड़ा हो जाए और भीड़ लग जाएगी। अब यूं सिर के बल खड़ा होना कोई बड़ी बात नहीं। कोई भी मूढ़ कर सकता है। सच तो यह है, सिवाय मूढ़ के और कौन करेगा!

अगर परमात्मा को तुम्हें सिर के बल ही खड़ा करना था, तो उसने सिर में टांगें उगा दी होतीं। परमात्मा शीर्षासन में बहुत उत्सुक नहीं है। अगर परमात्मा को ही तुम्हें कांटों की सेज पर लिटाना होता, तो तुम्हारे साथ ही कांटों की सेज भेज दी होती; इंतजाम कर दिया होता। उसने तुम्हारे प्रवास के लिए पूरा इंतजाम करके भेजा है। अगर परमात्मा उत्सुक होता तुम्हारे उपवासों में, तो उसने तुम्हें भूखा रखने की कला ही सिखा दी होती। अरे, जो भूख दे सका, वह भूखापन नहीं दे सकता था? अगर परमात्मा उत्सुक होता कि तुम छोड़ दो प्रियजन, तुम छोड़ दो मित्रजन, तुम छोड़ दो परिवार, तुम छोड़ दो लोग, तो तुम्हें परिवार में और प्रियजनों में, मित्रों में पैदा ही क्यों करता? यूं ही जैसे आकाश से वर्षा होती है, तुम भी बरस गए होते!

जार्ज गुरजिएफ कहा करता था कि तुम्हारे महात्मा, तुम्हारे सभी महात्मा परमात्मा के दुश्मन मालूम होते हैं। परमात्मा एक काम करता है, तुम्हारे महात्मा उससे उलटा काम करने को बताते हैं!

लेकिन राज है। राज यह है कि परमात्मा तो तुम्हें सहज, स्वाभाविक बनाता है; महात्मा तुम्हें असहज, अस्वाभाविक बनाते हैं। क्योंकि असहज, अस्वाभाविक होकर ही तुम आकर्षण के बिंदु बनते हो। लोगों के लिए तुम्हारे प्रति सम्मान तभी पैदा होगा, जब तुम कुछ उलटा करो।

अमरीका में एक विचारक हुआ, राबर्ट रिप्ले। वह प्रसिद्ध होना चाहता था। कौन प्रसिद्ध नहीं होना चाहता? चाहता था सारी दुनिया उसे जान ले। गांव में एक बहुत बड़ा सरकस आया हुआ था। सोचा उसने कि सरकस इतना प्रसिद्ध है, जग-जाहिर है; इसके मैनेजर को जरूर कुछ सूत्र पता होंगे प्रसिद्धि के। तो मैनेजर से उसने अलग से मुलाकात ली और कहा कि मुझे भी कुछ राज बताओ! मैं भी प्रसिद्ध होना चाहता हूं!

मैनेजर ने यूं ही मजाक में कहा...। सरकस का ही मैनेजर था; धंधा ही मजाक का था, तमाशबीनी का था। उसने कहा, इसमें क्या खास बात है! तुम अपने सिर के आधे बाल कटा लो, और चुपचाप, बिना कुछ बोले, जमीन पर टकटकी बांधे पूरे न्यूयार्क की सड़कों पर चक्कर काटते रहो। तीन दिन बाद आना।

तीन दिन बाद वह आया, तो साथ में अखबारों की बहुत सी कटिंग भी लाया। क्योंकि अखबारों में तस्वीरें ही छप गईं। चर्चा हो गई गांव में घर-घर में कि यह कौन है आदमी! आधे सिर के बाल कटाए हुए! कौन प्रसिद्ध न हो जाएगा?

रिप्ले ने मैनेजर को बहुत धन्यवाद दिया और कहा, अब आगे के लिए कुछ और बताएं! न्यूयार्क में तो जलवा हो गया; डुंडी पिट गई। एक बच्चा ऐसा नहीं है, जो न जानता हो। गांव-गांव, आस-पास भी खबर फैलने लगी।

मैनेजर ने कहा, अब तुम ऐसा करो, एक बड़ा आईना खरीदो। उस आईने को अपनी कमर पर बांध लो। आईने में देखो, तो पीछे का रास्ता दिखाई पड़ेगा। और बस पीछे की तरफ चलो, आगे की तरफ नहीं। और सारे अमरीका का चक्कर लगा डालो।

और रिप्ले ने वही किया। और चक्कर पूरा होते-होते अमरीका में ही नहीं, सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया--यह कौन आदमी है!

और उससे कहा, तू बिलकुल चुप रहना। बोलना है ही नहीं! जितना चुप रहेगा, उतना ही अच्छा। बोले, तो कहीं बात न खुल जाए! बुद्धिमान आदमी का बोलना अच्छा, बुद्धू का चुप रहना अच्छा। क्योंकि बुद्धू चुप रहे तो बुद्धिमान मालूम होता है!

सो रिप्ले बिलकुल चुप रहा। लाख लोगों ने पूछा। मुस्कुराए! कुछ कहे ही न। अरे, राज की बातें कहीं कही जा सकती हैं! शब्दातीत! कहो भी तो कैसे कहो? अनिर्वचनीय! प्रवचन से तो मिलती नहीं। बोलने से तो मिलती नहीं। कहने से तो कही नहीं जाती। हस्तांतरणीय नहीं। कोई जानने वाला ही जान ले, तो जान ले।

और मजा तो तब हुआ, जब रिप्ले ने पाया कि कुछ उसके शागिर्द भी पैदा हो गए; उसके पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने भी छोटी-छोटी व्यवस्थाएं कर लीं। जिससे जैसा दर्पण बन सका, ले आया। अकेला नहीं, अब रिप्ले की एक कतार चलने लगी! और वे भी सब चुप। अरे जब गुरु ही चुप है, तो शिष्य भी चुप!

कुछ भी, जो सामान्य नहीं है, असामान्य है; जो स्वाभाविक नहीं है, अस्वाभाविक है; उससे लोग प्रभावित होते हैं। लोगों को प्रभावित करना अहंकार की बड़ी गहरी अभीप्सा है।

ये जो भगोड़े हैं, इनसे लोग प्रभावित हुए। इनसे प्रभावित होने का कुल कारण इतना था कि ये कुछ कर रहे थे, जो अस्वाभाविक था। स्वाभाविक आदमी से कौन प्रभावित होगा?

जापान का एक सम्राट सदगुरु की तलाश कर रहा था। बहुत तलाश की; सदगुरु न मिला सो न मिला। जो-जो नाम ज्ञात थे, परिचित थे, पहचाने थे, वहां-वहां गया, लेकिन तृप्ति न हुई। अपने बूढ़े वजीर से पूछा कि मैं तो युवा हूं, तुम तो बूढ़े हुए। तुम्हें तो कुछ पता होगा। कोई तो ऐसा आदमी होगा...।

वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहा, आदमी तो हैं, लेकिन तुम न पहचान सकोगे। क्योंकि सच्चा सदगुरु बिलकुल सहज, स्वाभाविक होगा। उसमें कोई सींग थोड़े ही निकले होते हैं, जो तुम पहचान लोगे! तुम तलाश कर रहे हो किसी उलटे-सीधे आदमी की। लोग तो मिलेंगे बहुत उलटे-सीधे। मगर जो अभी खुद ही उलटे-सीधे हैं, वे तुम्हें क्या लाख उपाय भी करें तो मार्गदर्शन दे सकेंगे? तुम्हें भी और अस्तव्यस्त कर देंगे। तुम वैसे ही अराजक अवस्था में हो, वे तुम्हें और अराजक कर देंगे। मैं एक आदमी को जानता हूं...।

सम्राट तो उत्सुक था। वजीर को कहा, मैं चलने को राजी हूं।

वे दोनों गए मिलने उस फकीर को। वजीर तो चरणों पर गिर पड़ा फकीर के, लेकिन सम्राट उस आदमी को देख कर इस योग्य न पाया कि इसके चरणों में गिरे। आदमी बिलकुल साधारण था। और काम भी क्या कर रहा था! लकड़ियां काट रहा था।

अब कहीं सदगुरु लकड़ी काटते हैं? कि कहीं महावीर लकड़ी काटते मिले जाएं! कि बुद्ध लकड़ी काटते मिल जाएं! सदगुरु कहीं लकड़ियां काटते हैं?

सम्राट ने अपने वजीर से कहा कि यह आदमी लकड़ियां काट रहा है! इसकी क्या खूबी है? वजीर ने कहा, इसकी यही खूबी है। इसी से पूछो कि इसकी साधना क्या है! तो पूछा फकीर से कि तेरी साधना क्या है?

फकीर कोई और न था, झेन सदगुरु था, बोकोजू। उसने कहा, मेरी कोई साधना नहीं। जब भूख लगती है, तो भोजन कर लेता हूं। और जब नींद आती है, तो सो जाता हूं। मेरी कोई और साधना नहीं है।

सम्राट ने कहा, लेकिन यह कोई साधना हुई? यह भी कोई साधना हुई? यह तो हम सभी करते हैं। जब भूख लगती है,भोजन करते हैं। जब नींद आती है, सो जाते हैं।

बोकोजू ने कहा कि नहीं। इतने जल्दी निष्कर्ष न लो। कई बार तुम्हें भूख नहीं लगती, और तुम भोजन करते हो। और कई बार तुम्हें भूख लगती है, और तुम भोजन नहीं करते। और कई बार तुम्हें नींद आती है, और तुम सोते नहीं। और कई बार तुम्हें नींद नहीं आती, और तुम सोने की चेष्टा करते हो। इतना ही नहीं, तुम जब भोजन करते हो, तब और भी हजार काम करते हो। यंत्रवत भोजन करते रहते हो, और मन न मालूम किन-किन लोकों में भागा रहता है! और जब तुम सोते हो, तब तुम सिर्फ सोते ही नहीं। कितने-कितने सपने देखते हो! कहां-कहां नहीं जाते! क्या-क्या नहीं करते! मन का व्यापार जारी रहता है। मैं जब भोजन करता हूं, तो सिर्फ भोजन ही करता हूं। बस, भोजन ही करता हूं। उस वक्त भोजन करने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब सोता हूं, तो सिर्फ सोता हूं; उस समय सोने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब मुझे नींद आती है, तो मैं एक क्षण भी टालता नहीं; तत्क्षण सो जाता हूं।

बोकोजू कहता, जब नींद खुल गई, तब ब्रह्ममुहूर्त।

तो कभी-कभी दोपहर तक सोया रहता। और कभी-कभी आधी रात तक जागा रहता। जब नींद आएगी, तब सोएगा। जब भूख लगी, तो भोजन करेगा। कभी-कभी दिन, दो दिन बीत जाते और भोजन न करता। वह उपवास न था। और कभी-कभी दिन में दो बार भोजन करता। इतना नैसर्गिक!

मगर ऐसे आदमी से कौन प्रभावित हो? हम तो उलटे-सीधे लोगों से प्रभावित होते हैं। इसलिए भगोड़ों ने मनुष्य को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। वे हमसे उलटे थे। और हमसे उलटे थे इसलिए, मैं तुमसे कहता हूं, हम से जरा भी भिन्न न थे। हम जैसे ही थे। बस, हम पैर के बल खड़े हैं; वे सिर के बल खड़े थे। हम सोने के पीछे दीवाने हैं; वे डरते थे कि कहीं सोना छू न जाए। हम स्त्रियों के पीछे भागे जा रहे हैं, वे स्त्रियों के प्रति पीठ करके भागे जा रहे थे। मगर भाग जारी थी। और दोनों का केंद्र स्त्री थी। एक स्त्री की तरफ भाग रहा है; एक स्त्री से भाग रहा है। मगर दोनों की नजर स्त्री पर अटकी है। एक कहता है कि स्त्री में ही स्वर्ग है। और एक कहता है, स्त्री नर्क का द्वार है। मगर दोनों के लिए स्त्री महत्वपूर्ण है। किसी के लिए स्वर्ग का द्वार; किसी के लिए नर्क का द्वार। मगर द्वार स्त्री ही है।

मगर स्त्री से छुटकारा नहीं है ऐसे। न पुरुष से छुटकारा है। न धन से छुटकारा है।

विश्राम बनाने के लिए, विराम में जाने के लिए पक्षी घोंसले बनाते हैं, मनुष्य झोपड़े बनाते हैं या महल बनाते हैं। कुछ बुरा नहीं। बस, इतनी ही याद रहे कि उन सीमाओं में आबद्ध न हो जाना। वे सीमाएं तुम्हारी सीमाएं नहीं हैं। कोई सीमा तुम्हारी सीमा नहीं है। रहो जरूर, मगर अतिथि की तरह रहना; आतिथेय मत हो जाना। मेहमान की तरह रहना; मेजबान न हो जाना। तो फिर तुम जहां हो, वहीं संन्यासी हो।

आनंद मैत्रेय! तुमने पूछा कि "विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है...।'

वह उड़ने के लिए जरूरी है। उड़ने के लिए शक्ति संयोजित करनी होगी। जागने के लिए सोना होगा। भागने के लिए बैठना होगा। नहीं तो ऊर्जा विनष्ट हो जाएगी। वह घोंसला आकाश का दुश्मन नहीं है, संगी-साथी है; आकाश का हिस्सा है; आकाश ही है।

मगर कोई पक्षी घोंसले को पकड़ कर नहीं बैठ जाता। तुमने देखा! अंडे फूटते हैं; नए पक्षी पैदा होते हैं। रुकते हैं तब तक घोंसले में, जब तक उड़ने के योग्य नहीं हो जाते। और जिस दिन उड़े कि उड़े। फिर लौट कर आते ही नहीं। फिर घोंसले बनाएंगे, जब उनको खुद अंडे रखने होंगे।

जरूरत है, तो उपयोग करो। संसार का उपयोग करो।

संसार नहीं बांधता है। संसार से भागो मत, जागो।

तुम कहते हो, "और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजी, फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आज आप अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं...।'

यह अनहद में विश्राम अंतिम विश्राम है। यह आखिरी घोंसला है। फिर उसके पार और मकान नहीं बनाने पड़ते। शाश्वत घर मिल गया, फिर क्या मिट्टी के घरघूले बनाने! क्या फिर रेत के मकान बनाने! जो अभी बनाए और अभी गिरे! फिर क्या क्षणभंगुर में समय को व्यतीत करना है और व्यर्थ करना है! अनहद में बिसराम, दरिया की इस अदभुत सूचना का अंग है:

जात  हमारी  ब्रह्म  है, माता-पिता  है  राम।

गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम।।

इस सूत्र को समझ लो। यह सूत्र संन्यास का सार है।

"जात हमारी ब्रह्म है।'

जात का अर्थ होता है, जहां से हम जन्मे; जो हमारा वास्तविक जीवन-स्रोत है। इसलिए तुम्हारी जात हिंदू नहीं है, और मुसलमान नहीं है, और ईसाई नहीं है। क्योंकि बच्चा जब पैदा होता है, उसे पता ही नहीं होता कि हिंदू है, कि ईसाई है, कि मुसलमान है। बच्चा जब पैदा होता है, तो न तो संस्कृत बोलता है, न अरबी बोलता है, न लैटिन, न ग्रीक।

मैंने सुना है, एक फ्रेंच दंपति, जिनके बच्चे पैदा नहीं होते थे, एक अनाथ आश्रम से एक स्वीडिश बच्चे को गोद ले लिए। जिस दिन उन्होंने स्वीडिश बच्चे को गोद लिया, फ्रेंच दंपति ने, दोनों ने ही एक स्वीडिश शिक्षिका रख ली और स्वीडिश भाषा सीखने लगे। अचानक! पास-पड़ोस के लोगों ने पूछा कि क्या हुआ? स्वीडिश भाषा किसलिए सीख रहे हो? क्या स्वीडन में बस जाने का इरादा है? या कि स्वीडन की लंबी यात्रा पर जा रहे हो?

उन्होंने कहा, नहीं-नहीं। एक स्वीडिश बच्चे को गोद लिया है। इसके पहले कि वह बड़ा हो और स्वीडिश भाषा में बोलना शुरू करे, हमें कम से कम स्वीडिश तो सीख लेनी चाहिए। नहीं तो हम समझेंगे क्या खाक कि वह क्या बोल रहा है!

बच्चे न तो स्वीडिश बोलते हैं, न फ्रेंच, न हिंदी, न अंग्रेजी। बच्चों की कोई भाषा नहीं होती; शून्य उनकी भाषा होती है; मौन उनकी भाषा होती है। और उनकी कोई जात नहीं होती। हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं। सब जातें हम थोप देते हैं। और क्या गजब हुआ है! जातों पर जातें थोपे चले जाते हैं। हिंदू होने से ही काम नहीं चलता। फिर उसमें ब्राह्मण; फिर उसमें क्षत्रिय; फिर वैश्य; फिर शूद्र। इतने से भी काम नहीं चलता। फिर अब ब्राह्मणों में भी कोंकणस्थ और देशस्थ!

विनोबा भावे से किसी ने पूछा कि आप कोंकणस्थ ब्राह्मण हैं या देशस्थ? विनोबा ने अपनी सूझ-बूझ के हिसाब से ठीक ही उत्तर दिया, हालांकि मुझे कुछ बहुत ठीक नहीं लगता। उन्होंने कहा, न तो मैं कोंकणस्थ ब्राह्मण हूं, न देशस्थ। मैं तो स्वस्थ ब्राह्मण हूं।

बात तो ठीक है। लेकिन मेरा इतना ही निवेदन है कि इसमें पुनरुक्ति है। स्वस्थ, ब्राह्मण, दोनों का एक ही अर्थ होता है। स्वस्थ का अर्थ होता है, स्वयं में स्थित हो जाना। और ब्राह्मण का अर्थ होता है, स्वयं के ब्रह्म को जान लेना। इसलिए स्वस्थ ब्राह्मण, एक ही बात को कहने के लिए दो शब्द उपयोग कर रहे हो। उचित नहीं है। ब्राह्मण होना काफी है। स्वस्थ होना काफी है। स्वस्थ ब्राह्मण होने की कोई जरूरत नहीं है। एक ही बात को कहने के लिए दो शब्द क्यों उपयुक्त करने? क्यों उपयोग करना?

लेकिन यूं उनकी बात ठीक है कि कोंकणस्थ नहीं, देशस्थ नहीं। लेकिन खतरा यह है कि कुछ स्वस्थ ब्राह्मण पैदा हो सकते हैं। ऐसे ही तो जातियां पैदा होती हैं। विनोबा के पीछे चलने वाले ब्राह्मण कहने लग सकते हैं कि हम स्वस्थ ब्राह्मण हैं। फिर एक जाति पैदा हो गई।

क्या ब्राह्मण होना पर्याप्त नहीं है? क्या ब्रह्म होना काफी नहीं है? क्या ब्रह्म से और कोई परिष्कार हो सकता है? क्या ब्रह्म को सुंदर बनाया जा सकता है, कुछ और शब्द उस पर आरोपित कर दिए जाएं तो?

दरिया ठीक कहते हैं: "जात हमारी ब्रह्म है।'

तो न तो हम हिंदू हैं, न मुसलमान, न ईसाई; न ब्राह्मण, न शूद्र,न क्षत्रिय, न वैश्य। हम ब्रह्म से आए हैं। ब्रह्म का अर्थ है, जीवन का स्रोत; इस विराट अस्तित्व का मूल स्रोत। उस ब्रह्म से हमारा आना हुआ है, और उसी में हमें लौट जाना है। और जिसने इन दोनों के बीच--आने और जाने के बीच, आवागमन के बीच--उसको पहचान लिया, फिर उसका आवागमन मिट जाता है। जिसने जन्म और मृत्यु के बीच अपने भीतर के ब्रह्म को पहचान लिया, फिर उसे दुबारा आने की कोई जरूरत नहीं रह जाती।

यह जीवन है ही इसलिए, पाठशाला है, कि हम अपने भीतर के ब्रह्म के प्रति सजग हो सकें, जाग सकें, पहचान सकें।

पहचान के लिए एक गणित खयाल में रखना। मछली सागर में पैदा होती है, लेकिन जब तक सागर में रहेगी, उसे पता ही नहीं चलेगा कि सागर क्या है। खींच लो सागर से! कहो किसी मछुए से, निकाल ले मछली को सागर के बाहर। छोड़ दो तट पर, धूप में, तपी हुई रेत पर। तड़पने दो थोड़ा। और फिर उसे वापस सागर में छोड़ दो। मछली वही है, सागर वही है, लेकिन सब बात बदल गई। अब मछली जानती है कि सागर क्या है। पहले नहीं जानती थी। अब बोध हुआ। अब पता चला कि सागर ही मेरा जीवन है, मेरा आनंद है, मेरा उत्सव है। अब पता चला, सागर ही मेरा संगीत है; सागर ही मेरा नृत्य है। सागर से क्षण भर को छूटना, और नर्क और पीड़ा और दुर्दिन और दुर्भाग्य की शुरुआत! हम ब्रह्म के सागर से आते हैं; मछलियां हैं, जो संसार के तट पर फेंक दी गईं। जान-बूझ कर फेंकी गई हैं, ताकि पाठ सीख लें। पाठ सीखने का एक ही उपाय है कि थोड़ी देर के लिए बिछुड़न हो जाए। अगर मिलन कभी टूटे ही न, तो बोध नहीं होता।

एक बहुत बड़े अमीर ने जीवन के अंतिम दिनों में तय किया कि सब मैंने पा लिया--धन, पद, प्रतिष्ठा; हीरों के ढेर लग गए--लेकिन सुख तो मैंने जाना नहीं, क्षण भर को न जाना। धन को पाने में दुख उठाया। धन पाकर कुछ सुख मिलता नहीं। धन तो है, लेकिन सुख कहां! और जीवन की अंतिम घड़ी पास आने लगी। सूरज ढलने लगा है। अब ढला, तब ढला। यह उतरने लगा पश्चिम में सूरज। कभी भी रात आ जाएगी। इसके पहले कि मौत आए, सुख को तो जानना ही है।

तो उसने एक बहुत बड़ी झोली में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात भरे; अपने घोड़े पर सवार हुआ। बहुत फकीरों के पास गया। और फकीरों से कहा, यह सारा धन देने को तैयार हूं। सुख की एक झलक दिखा दो!

मगर कौन सुख की झलक दिखाए? कैसे सुख की झलक दिखाए? उत्सुक तो फकीर भी थे उसके धन को लेने में। और जो उसके धन को लेने में उत्सुक थे, वे क्या खाक सुख की झलक दिखाएंगे! अभी तो उनको खुद भी झलक नहीं मिली! अभी तो वे भी सोच रहे हैं कि धन मिल जाए, तो शायद झलक मिले! और आंख के होते हुए अंधे हैं। इस आदमी को धन मिल गया और धन का झोला लिए घूम रहा है कि मैं देने को तैयार हूं किसी को भी। एक झलक, बस एक झलक! एक नजर भर कर देख लूं सुख क्या है, कि सब निछावर कर दूंगा।

फिर एक सूफी फकीर की उसको खबर मिली। लोगों ने कहा, हम तो न दे सकेंगे झलक। सच तो यह है कि तुम्हारा धन देख कर हमारे भीतर तुमने लालच जगा दिया। हमारी न मालूम कितने दिनों की तपश्चर्या और साधना डगमगा दी। तुम भागो यहां से! ले जाओ अपना धन! हम पहुंचे ही जा रहे थे, पहुंचे ही जा रहे थे, कि तुमने चुका दिया। तुम खुद भी चूके और हमको भी चुका दिया। हां, एक फकीर है, वह जरा उलटा-सीधा फकीर है। शायद वही तुम्हारे काम आए।

तो गया धनपति। अपने घोड़े को रोका उस फकीर के वृक्ष के नीचे। फकीर को अपनी पूरी कथा सुनाई। फकीर ने गौर से सुनी। धनपति ने अपना झोला भी खोल कर दिखाया। हीरे-जवाहरातों का ढेर था उसमें। अरबों-खरबों के होंगे। फकीर ने कहा, झोला बंद कर!

झोला धनपति ने बंद किया। लगा कि फकीर है तो कुछ पहुंचा हुआ। और दूसरे फकीरों को तो झोले में एकदम रस आ गया था। एकदम उनकी आंखों से लार टपकने लगी थी। वे तो भूल ही गए थे इसको सुख देने की बात। वे तो खुद ही के सुख पाने की आकांक्षा में तल्लीन हो गए थे।

इस फकीर ने कहा, बंद कर ये कचरे को! झोला बंद कर! फिर कुछ सुख दिखाने की बात बने। धनपति ने झोला बंद किया। यह फकीर जंचा। जिसने जीवन भर धन इकट्ठा किया हो, उसको ऐसा ही आदमी जंचता है। और जैसे ही उसने झोला बंद करके एक तरफ रखा, फकीर उठा और झोला लेकर भाग खड़ा हुआ!

एक क्षण को तो धनपति को कुछ समझ में ही नहीं आया कि क्या हो रहा है! किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। जब होश आया, तब तक तो फकीर यह गया वह गया! नौ दो ग्यारह हो गया! उसको तो जगह परिचित थी। वह जंगल परिचित था; वह पास में ही बसा गांव परिचित था। इस धनपति को तो सब अपरिचित था। भागा एकदम उसके पीछे; बेतहाशा भागा। घोड़े को भी छोड़ गया। भूल ही गया घोड़े की बात। चिल्लाता हुआ, कि लुट गया! बर्बाद हो गया! मेरी जिंदगी भर की मेहनत पर पानी फेर दिया। अरे, यह कोई फकीर नहीं है; यह बदमाश है; लुच्चा है; चोर है! चिल्लाता जाए, भागता जाए: पकड़ो-पकड़ो!

सारा गांव खड़े होकर देख रहा था। गांव तो फकीर को जानता था। वह कई करतब इस तरह के पहले कर चुका था! उसके कामों से तो लोग परिचित थे कि वह कुछ उलटा-सीधा करता है! कुछ किया होगा। कोई पकड़ने में उत्सुक नहीं दिखाई पड़ रहा था। और धनपति और भी हैरान था। फिर तो वह गालियां पूरे गांव को देने लगा कि पूरा गांव बदमाशों का, लुच्चों का है। यह फकीर तुम्हारा नेता है या क्या बात है! पकड़ते क्यों नहीं?

लोग हंस रहे थे, खिलखिला रहे थे। मगर उसके प्राणों पर बनी थी। हांफता, भागता, फकीर का पीछा करता रहा। फकीर वापस पहुंच गया उसी झाड़ के नीचे जहां घोड़ा खड़ा था अब भी। झोले को वहीं रख दिया जहां से उठाया था, झाड़ के पीछे जाकर खड़ा हो गया छिप कर।

थोड़ी ही देर बाद धनपति भी हांफता, पसीने से लथपथ,जिंदगी में कभी ऐसा दौड़ा नहीं था। मौका ही न आया था। झोला देखा, एकदम उठा कर छाती से लगा लिया और कहा कि हे परमात्मा! धन्य है तू। किन शब्दों में तेरा आभार करूं! आत्मा को ऐसी शांति मिल रही है, ऐसा सुख मिल रहा है, कभी नहीं मिला!

फकीर बोला, मिला? चलो थोड़ा दर्शन तो हुआ। झलक मिली?

यह धनपति को पता नहीं था कि वह झाड़ के पीछे छिपा है। फकीर बाहर आ गया; अपनी जगह बैठ गया। उसने कहा, देख, तू कहता था झलक दिखा दो, दिखा दी। अब अपने घर जा। अब आगे काम तू कर। तब धनपति को बोध आया। चरणों पर गिरा। कहा कि मैं पहचाना नहीं। लुच्चा-लफंगा चिल्लाया, गालियां दीं, पूरे गांव को गालियां दीं। अब मैं समझा कि वे गांव के लोग क्यों तुम्हें नहीं पकड़ रहे थे। वे तुम्हें जानते होंगे। मगर तुमने क्या गजब किया!

फकीर ने कहा, इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था। यही परमात्मा की विधि है, और यही समस्त सदगुरुओं की विधि है। तुमसे जब तक हटा न लिया जाए, तब तक तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। अचानक तुम्हें सुख मिल गया! यह झोला तो तुम्हारे पास सदा से था। पहले छाती से लगा कर परमात्मा को धन्यवाद नहीं दिया। आज क्यों धन्यवाद दे रहे हो? थोड़ी देर को मछली सागर से छूट गई।

यह संसार एक शिक्षण की व्यवस्था है। इसलिए जिन्होंने तुमसे कहा है संसार छोड़ दो, वे वे ही लोग हैं, जो तुम्हारे बच्चों को समझाएं कि स्कूल छोड? दो; भाग खड़े होओ!

यह स्कूल है, इसे छोड़ना नहीं है। यहां कुछ सीखना है। यहां परमात्मा से विरह हो गया हमारा। वह जो हमारा मूल स्रोत है, उदगम है, ब्रह्म है, उससे हमारा नाता टूट गया है। इस विरह को भोगना है, ताकि फिर से मिलन की संभावना बन सके। और विरह के बाद जो मिलन है, उसका मजा ही और है।

"जात हमारी ब्रह्म है, माता-पिता है राम।'

जात भी हमने खो दी। न मालूम क्या-क्या बन कर बैठ गए हैं। जमीन पर कोई तीन सौ धर्म हैं। और तीन सौ धर्मों में कम से कम तीन हजार छोटी-छोटी जातियां, उप-जातियां, और न मालूम क्या-क्या...कितना जाल फैला दिया है! और जिनको हम भले लोग कहें, उनके भीतर भी वही जाल है।

शंकराचार्य जैसे व्यक्ति को, जिनको भारतीय सोचते हैं वेदांत की पराकाष्ठा, उनको भी एक शूद्र ने छू दिया, तो वे नाराज हो गए। शंकराचार्य! पानी फेर दिया सब वेदांत पर; भूल गए सब बकवास कि जगत माया है और ब्रह्म सत्य है। तत्क्षण पता चला शूद्र सत्य है; ब्रह्म वगैरह कोई सत्य नहीं। एक शूद्र ने छू दिया। भूल गए ज्ञान; भूल गए चौकड़ी! एकदम क्रुद्ध हो गए और कहा कि मूढ़, शूद्र होकर तुझे इतनी समझ नहीं कि ब्राह्मण को छू दिया? और मैं अभी गंगास्नान करके आ रहा हूं!

स्नान करके वे चढ़ ही रहे थे दशाश्वमेध की सीढ़ियां, तभी उस शूद्र ने छू दिया। सुबह-सुबह का अंधेरा। अब मुझे फिर स्नान करना पड़ेगा!

उस शूद्र ने कहा, स्नान आप जरूर करिए। मगर इसके पहले कि स्नान करें, मेरे कुछ सवालों का जवाब दे दें। एक तो यह कि अगर संसार माया है, तो किसने किसको छुआ? अगर मैं हूं ही नहीं, अगर यह देह भ्रम है, तो दो भ्रम एक-दूसरे को छू सकते हैं? और अगर छू भी ले भ्रम भ्रम को, तो क्या हर्जा है? और तुम्हारा भ्रम पवित्र, और मेरा भ्रम अपवित्र? कुछ तो संकोच करो! कुछ तो लाज करो! कुछ तो अपने कहे का खयाल करो! थूके को इतनी आसानी से तो न चाटो! फिर मैं यह भी पूछता हूं कि गंगा में स्नान करने से शरीर पवित्र हुआ कि आत्मा पवित्र हुई? पानी शरीर को छुएगा कि आत्मा को? अगर शरीर पवित्र हुआ है, तो शरीर क्या पवित्र हो सकता है? क्योंकि शरीर तो मिट्टी है। और तुम्हीं तो समझाते हो कि शरीर में कुछ भी नहीं है।

उपनिषद्

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूलाधार है, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिंतनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएँ हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बाँधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अंतर्दृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

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उपनिषद, दर्शन आदि  का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का मृत्यु के प्रती भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानीयों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने ने भी योगदर्श्न, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था । महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । 

उपनिष

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूलाधार है, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिंतनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएँ हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बाँधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अंतर्दृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

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Upanishads - Krishna Yajurveda - Kathopanisad

 

 

 

 

 

 

Upanishads - Krishna Yajurveda - Kathopanisad

॥ कठोपनिषद् ॥
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
॥ अथ कठोपनिषद् ॥

Part I
Canto I
ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १॥
त ह कुमार सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । 
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।
द्वितीयं तृतीयं त होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
कि स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ५॥
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥
वैश्वानरः प्रविशति अतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।
तस्यैता शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥
आशाप्रतीक्षे सङ्गत सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८॥
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९॥
शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभिमृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथम वरं वृणे ॥ १०॥
यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुख रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ ११॥
स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२॥
स त्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्व श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३॥
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५॥
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६॥
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्य मा शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७॥
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२॥
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्वा बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४॥
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २५॥
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९॥
॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

Part I
Canto II
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुष सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु
भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १॥
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥
स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामान्
अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । 
नैता सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३॥
दूरमेते विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥
न साम्परायः प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा
आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥
न नरेणावरेण प्रोक्त 
एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति
अणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८॥
नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥
जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि-
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां
क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां 
दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११॥
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२॥
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः
प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा
विवृत सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा-
दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च
यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६॥
एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥
न जायते म्रियते वा विपश्चि-
न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥ १९॥
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१॥
अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२॥
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् ॥ २३॥
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥
इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

Part I
Canto III
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १॥
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि ॥ २॥
आत्मानं रथितं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १०॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११॥
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२॥
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५॥
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते । तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥
इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ॥

Part II
Canto I
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १॥
पराचः कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३॥
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४॥
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६॥
या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७॥
अरण्योर्निर्हितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८॥
यतश्चोदेति सूर्यः अस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९॥
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १०॥
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३॥
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५॥
इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

Part II
Canto II
पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥ १॥
हसः शुचिषद्वसुरान्तरिक्षस-
द्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमस-
दब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३॥
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४॥
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६॥
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८॥
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु-
र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥
नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना-
मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३॥
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५॥
इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

Part II
Canto III
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शातख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १॥
यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २॥
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३॥
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४॥
यथादर्शे तथाऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ।
यथाऽप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके
च्छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५॥
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६॥
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७॥
अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८॥
न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९॥
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १०॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११॥
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥ १५॥
शतं चैका च हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति
विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७॥
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८॥
सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ १९॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इति काठकोपनिषदि द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ॥

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ तत् सत् ॥

 

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