आदमी के भीतर के आदमी
तुम में एक आदमी ऐसा है जो ओरीजनल है, जो बचपन में अकेला था। वह बाहर आता था जस का तस ही। जो सोचता था वही बोलता था, जो करता था वह भी अपनी विशुद्ध सोच के अनुसार। उस आदमी की अपनी खिंची सरल रेखा थी, वैसी ही राह बनाता था और अपनी उसी राह पर चलता था।
पर बाद में इसके अलावा कई और आदमी भी उस आदमी में घुस गये, कहना चाहिये एक भीड़ की भीड़ उसमें घुस गई। ये सब अपने अपने विचार और समझ ले कर घुसे। इनमें शामिल थे एक प्रोफेशनल, एक रिश्तेदार, एक दो मुहा, एक अतिवादी, एक प्रेमी, एक नायक, एक खलनायक आदि आदि। अब मूल आदमी वयस्क हो कर तरह तरह के आदमियों से भरा तेतरी चिड़ियाखाना हो गया। सब के सब रंगमंच के पर्दे के पीछे बैठे रहते हैं। एक एक करके आते हैं, अपनी कला-कौशल दिखाते हैं और फिर नेपथ्य में चले जाते हैं। इस रंगमंच का सूत्रधार मूल आदमी ही है। सामने प्रेयसी हो तो प्रेमी निकलता है, ग्राहक खड़ा हो तो व्यापारी निकलता है। जब जो जरूरत पड़ जाय वैसा आदमी निकलता है।
यहाँ तक तो लगभग ठीक ही है पर कभी कभी निकले इस एक आदमी के पीछे दुबक कर पीछे दूसरा आदमी खड़ा हो जाता है; शायद इनके लिये ही कहावत बनी है "मुह में राम, बगल में छुरी"। ऐसे में दिखता कोई और है, करता कोई और है। दिखने वाला मुखौटा है, करने वाला वह पीछेवाला है।
वो परमहंस है जो अपने भीतर एक ही आदमी रखता है। वह दानी है जो सिर्फ बाँटता है, प्रतिफल नहीं चाहता। वह गुरू है जो तारता है। प्रकृति ने मौलिक रचनाएँ की है। सूरज में केवल सूरज, चाँद में केवल चाँद, आग में केवल आग बनाई। वहाँ वही है जिसके लिये मौलिक सृजन हुआ है। हम में भी मौलिक एक आदमी ही आया था। हमने कॉपी पेस्ट करके कई बिम्ब खड़े कर लिये, आदमियों की एक भीड़ खड़ी कर ली। भीड़ है तो भगदड़ मचेगी, भीड़ है तो कोलाहल होगा, भीड़ है तो अनियन्त्रित रेला होगा। भीड़-भाड़ में भीड़ के साथ प्रयुक्त भाड़ से शायद तात्पर्य यह है कि कहीं तो आग जल रही है जिसकी तपिश से सारे दानों में विस्फोट होता है। सारे दाने एक साथ आवाजें करते हैं। कई कई आवाजें। ये दाने बाद में दाने नहीं होते पॉप कॉर्न हो जाते हैं। भाड़ में स्वयं दानों की भीड़ ही है।
जीवन स्वयं एक रंगमंच है, मन सूत्रधार है, बुद्धि अनुशासक हो और यह समग्र तुम हो, मैं हूँ, सब है। यह मैं नहीं, कठोपनिषद कहता है।
इसमें अपने रथ के स्वामी आप स्वयं हैं। जैसा चाहो वैसा हाँको। अपने भीतर थोड़ा झाँको।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
रामनारायण सोनी
१५.१.२५
मित्रों!
हमारे वेदान्त जीवन के व्यवहार में उतरें तो हम सनातन की ओर लौट सकते हैं।
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