निर्झर सी दो-दो आँख झरी
इन सुलगे गीतों के तन को
मृदु नेहिल छुअन अपेक्षित है
इसकी क्षत-विक्षत सुधियों का
सहमा मन-प्राण विकंपित है
स्वर के अंचल में गाँठ पड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
विरही इन गीतों की उर्मिल
करुणा-वरुणा अवशेष हुई
टूटा तारक काली रजनी में
अंतिम पथ की अवरेख हुई
वाणी रसना से रूठ खड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
मधु-सिंचित अमृत-कोशों से
अक्षर-अक्षर रस रंग ढले
गीतों के अन्तस में फिर क्यों
तपते स्वप्नों की प्यास पले
शब्दों में तीखी फाँस गड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
इस विकल वेदना ने आ कर
गीतों को पल पल तड़पाया
गूँजा विहान निश्वासों से
अम्बर का जी भी भर आया
क्यों संसृति लिये कृपाण खड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
रामनारायण सोनी
२८.१.२५
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