Sunday, 12 January 2025

मेरे जीवन के भोले स्वप्न


मेरे जीवन के भोले स्वप्न

सहज ममता की गोद पले
दबी आशाओं का उपवन
सहमते सिकुड़े कृश वे गात
अधखिली कलियों सा बचपन
        छुड़ा कर जाता निष्ठुर हाथ
        भाग्य ने असमय किया अनाथ

नहीं थे पद में भी पदत्राण
ठिठुरते महाशीत से प्राण
मचा करता तन में रौरव
संभलता उठता गिरता मन
          मर्म में सोये स्वर्णिम स्वप्न
          बँधाता ढाढस केवल मन

शीश पर केवल नील गगन
हृदय में केवल टीस चुभन
जीवनी केवल थी आधार
कोई था थामे हर धड़कन
          चला जब श्रम-निर्झर वह मौन
          चला था संग न जाने कौन

टाट के बस्ते रखी किताब
उँगलियों पर था सभी हिसाब
श्याम थी पट्टी, पट भी श्याम
छ्ड़ी का, गुरु का बड़ा रुबाब
          गणित का समवेती वह गान
          याद है बालसभा का ज्ञान

स्वप्न बादल के छौनों से
उछल कर आते कोनों से
रचा करते नित नूतन बिम्ब
बात करते थे पवनों से
          इन्हीं में कितने हुए मगन
          इन्हीं ने ढाला है जीवन

स्वप्न थे वे जीवन के गीत
कभी ना बिछड़े ये मनमीत
सभी के अपने हैं संसार
यही है जीवन के संगीत
          कभी बतियाता इनसे मन
           बना जीवन जिससे मधुबन

रामनारायण सोनी
१३.१.२५

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