मेरे जीवन के भोले स्वप्न
सहज ममता की गोद पले
दबी आशाओं का उपवन
सहमते सिकुड़े कृश वे गात
अधखिली कलियों सा बचपन
छुड़ा कर जाता निष्ठुर हाथ
भाग्य ने असमय किया अनाथ
नहीं थे पद में भी पदत्राण
ठिठुरते महाशीत से प्राण
मचा करता तन में रौरव
संभलता उठता गिरता मन
मर्म में सोये स्वर्णिम स्वप्न
बँधाता ढाढस केवल मन
शीश पर केवल नील गगन
हृदय में केवल टीस चुभन
जीवनी केवल थी आधार
कोई था थामे हर धड़कन
चला जब श्रम-निर्झर वह मौन
चला था संग न जाने कौन
टाट के बस्ते रखी किताब
उँगलियों पर था सभी हिसाब
श्याम थी पट्टी, पट भी श्याम
छ्ड़ी का, गुरु का बड़ा रुबाब
गणित का समवेती वह गान
याद है बालसभा का ज्ञान
स्वप्न बादल के छौनों से
उछल कर आते कोनों से
रचा करते नित नूतन बिम्ब
बात करते थे पवनों से
इन्हीं में कितने हुए मगन
इन्हीं ने ढाला है जीवन
स्वप्न थे वे जीवन के गीत
कभी ना बिछड़े ये मनमीत
सभी के अपने हैं संसार
यही है जीवन के संगीत
कभी बतियाता इनसे मन
बना जीवन जिससे मधुबन
रामनारायण सोनी
१३.१.२५
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