तू हहर हहर कर बह निर्झर
जल की धारा को दूध बना
निज गिरने को उत्कर्ष बना
माना पाषाण बिछे तल में
उन पर भी धीरे ही बहना
कहो! डरता है मुझसे डर
हहर हहर कर बह निर्झर
रेवा की धारा धुआँ बना
सत का शिव संगीत सुना
गति का रुक जाना मरना है
है बहना जीवन को पाना
वह पथ ना जाय बिसर
हहर हहर कर बह निर्झर
तुझमें इक इन्द्रधनुष होगा
तेरा कण कण भी खुश होगा
तेरी करुणा से तृप्त पवन
तेरा यह धवल वपुष होगा
जगत यूँ जाए ना बिफर
हहर हहर कर बह निर्झर
कलित कल कल करती धार
बाहुओं का दोनों विस्तार
हृदय में अनहद का अनुनाद
पगों में शिला बनी आधार
जगत है सारा एक समर
हहर हहर कर बह निर्झर
शीश पर धारा का अभिषेक
पगों से बहती जल अवरेख
लजीली लतिका की झालर
बने सब अर्चन के आलेख
नियति के फूटे हैं निर्झर
हहर हहर कर बह निर्झर
रामनारायण सोनी
17.1.25
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