Friday, 17 January 2025

जैसे तुम आई

जैसे तुम आई 

चंचल चितवन के आतुर से
मृग-शावक दौड़े आते हैं
नभ में आकुल से श्याम मेघ
अलकावालियाँ लहराते हैं 
        बँकपाँति वेणी सी बीच बीच
        सुभगे! तुम अन्तर में आई

रँग रहा मदन यह अन्तर-पट
कुछ बिम्ब निराले औ' नटखट
आगत के स्वागत में विह्वल
उस पंथ बिछे हैं नयन निपट
        उज्ज्वल स्मृति की रेख खींच        
        सुचिते! तुम बदरी सी छाई

इन तृषित नयन की सँझवाती 
पुतली के गोलक आराती
दीपित दीपों की कनक किरण
अनुबन्ध मिलन के दोहराती
        उर के भावों को सींच सींच
        तुम! नव-कलिका सी मुस्काई

सज्जित कानन का पोर पोर
नवअंकुर लखता हो विभोर
झरता पद्मों का पद्मराग
गुम्फित शलभों का मन्द्र शोर
         विहगों का मधुरव बीच बीच
         शुचिते! हर ओर लगा कि तुम आई

रामनारायण सोनी
१८.१.२५

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