Thursday, 9 January 2025

आस के बादल न बिखरे

आस के बादल न बिखरे

क्षिप्त मन के पृष्ठ पर 
अंकित सभी तेरी कथाएँ
क्यों करुण के राग में ये
व्यथित हैं सब गीतिकाएँ
        लोचनों की कोर भींगी
        स्वप्न के मुक्ता न बिखरे
        
साँझ का या भोर का नभ
नीरदों का रंग लोहित
संधियाँ दिन की निशा की
संवेग से होती विकम्पित
        भित्तियाँ उर की पनीली
        गान पीड़ा के न उभरे

सुप्त वंशी के हृदय में
है प्रतीक्षा बस पवन की
रंध्र में स्वर चेतना भर
जिन्दगी जागे विजन की
        बिजलियाँ कितनी कँटीली
        आस के बादल न बिखरे
       
कामना के विहग उड़ कर
नीड़ में फिर लौट आये
रात सोयी नभ निलय में
प्राण! तुम ना लौट पाये
        वादियाँ मन की रुपहली
        उम्र बीती तुम न बिसरे
        
रामनारायण सोनी
10.1.25

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