आस के बादल न बिखरे
क्षिप्त मन के पृष्ठ पर
अंकित सभी तेरी कथाएँ
क्यों करुण के राग में ये
व्यथित हैं सब गीतिकाएँ
लोचनों की कोर भींगी
स्वप्न के मुक्ता न बिखरे
साँझ का या भोर का नभ
नीरदों का रंग लोहित
संधियाँ दिन की निशा की
संवेग से होती विकम्पित
भित्तियाँ उर की पनीली
गान पीड़ा के न उभरे
सुप्त वंशी के हृदय में
है प्रतीक्षा बस पवन की
रंध्र में स्वर चेतना भर
जिन्दगी जागे विजन की
बिजलियाँ कितनी कँटीली
आस के बादल न बिखरे
कामना के विहग उड़ कर
नीड़ में फिर लौट आये
रात सोयी नभ निलय में
प्राण! तुम ना लौट पाये
वादियाँ मन की रुपहली
उम्र बीती तुम न बिसरे
रामनारायण सोनी
10.1.25
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