गीत अधरों पर धरे हैं
गीत मेरे प्रीत की रसगंध ले कर
शब्द सारे भाव के सम्बन्ध ले कर
चिर प्रतीक्षा खुद खड़ी दहलीज पर
सज्ज प्राणों का मुकुल है यह विवर
ओ सुनयने, पंथ का पाथेय ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
तारिका निस्तब्ध अवनी झाँकती सी
दीप की लौ भी पवन से काँपती सी
वृन्द कानन के तृणों में कम्प कैसा
बद्ध छन्दो में घुली तुम आरती सी
ओ सुनयने, कण्ठ का आधार ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
शतदलों के पत्र पर अंकित निमन्त्रण
लोल लहरों में विरंजित लास कण
अंजुरी भर प्रीत का आभार ले कर
सब विसर्जित रूढ़ियों के आवरण
ओ सुनयने, थाल भर श्रृंगार ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
रामनारायण सोनी
५.१.२५
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