राष्ट्र देव
अपना चिर संचित पुण्यकोष
जग के अरण्य में महका है
विपुल धरा का कण-कण भी
यूँ चंचरीक सा चहका है
ऋषियों की वाणी ऋतम्भरा
हवि संग ऋचाओं का होता
पावन यज्ञों की समिधा से
मंगलमय हवन जहाँ होता
हैं श्रृंगशिखर ये कनक मढ़े
हैं वृक्ष रूप में रोम खड़े
अंगों से बहता पावन जल
इस नग विराट के दान बड़े
भूतल पर बहती सरिताएँ
संस्कृति की ये पुष्ट शिराएँ
श्वेत श्याम इन पाषाणों से
निर्मित देवों की प्रतिमाएँ
भू भाग घिरा जो सीमा से
केवल वह, राष्ट्र नहीं है
जन गण मन भाषा भाव जुड़ें
समझो सब राष्ट्र यही है
उत्तर में उन्नत नग विशाल
केसर सौरभ से लसित भाल
प्राची पश्चिम के भुज प्रलम्ब
उर में संस्कृति की विजय माल
दक्षिण में द्रविड़ धरोहर है
वैभव का मान सरोवर है
आदिकाल की परम्परा का
पालक पोषक तरुवर है
आएँ मिल कर करें वन्दना
राष्ट्र देव की करें अर्चना
विश्व-गगन में, सर्व दिशा में
विजय गान की गूँज-गर्जना
भारत फिर से हो विश्व गुरू
फिर से जानें रघु और पुरू
वसुधा के कोने कोने में
हों फिर से गौरव गान शुरू
राष्ट्र सुरक्षित और सबल हो
कोटि कण्ठ जयघोष करें
कोटि करों से संकल्पों का
जन जन मिल उद्घोष करें
रामनारायण सोनी
१८.१.२५
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