Friday, 24 January 2025

फिर से अलसाये गीत जगे

फिर से अलसाये गीत जगे

गीतों की झिपती पलकों में
थे अभी अभी सपने सोये 
जो जागे जुगनू-जंगल में
सिकता में अपने आँसू बोये
      फिर से नीरव में प्रेम पगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

थी एक कहानी दबी छुपी
जिसमें सौरभ थी घुली मिली
उन पोथी के पीले पृष्ठों में
जो दबी मधुर मुस्कान मिली
      सूखी पँखुड़ी में प्राण जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

फिर कदम्ब की डाली पर
हौले से इन्दु उतर आया
था धवल धरा से उसकी वो
प्रिय का प्रिय बिम्ब उभर आया
      हर पोर पोर उल्लास जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

तितली के पंख पराग सने
मधु रंजित धूसर-धूलि हुई
गीतों का गात सिहर उठता
जैसे सहसा हो तड़ित छुई
      कानन में सौ सौ फाग जगे
      फिर से अलसाये गीत जगे

रामनारायण सोनी
२४.१.२५

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