Tuesday, 21 January 2025

लौट जाओ फिर वहीं तुम!

लौट जाओ फिर वहीं तुम!

तुम अभी लौटे क्षितिज से
ले चिट्ठियाँ कोरी करों में
क्या सभी पनिहारियाँ वे
सब मौन थी बैठी घरों में
      बिन लिखे संवाद कागज
      ए पवन! क्यों ज्वाल लाये
      लौट जाओ फिर वहीं तुम!

हिम शिखर की उर्मियों तुम 
सब सँदेशे भूल आई
अंक में अपने सुलगते
क्यों विरह के दंश लाई
       बिन स्वरों के गीत की तुम
       ए लहर! क्यों बात लाई
       लौट जाओ फिर वहीं तुम!

नील नभ के ओ प्रवासी
रीते आये उस नगरी से
प्यास बुझेगी मन की कैसे
लाई रीती इस गगरी से
        बिना खबर के अग्रदूत तुम
        ए मेघ! यों ही व्यर्थ आये
        लौट जाओ फिर वहीं तुम!

   रामनारायण सोनी
    २२ जनवरी २५

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