Wednesday, 1 January 2025

कहाँ ले जाता मुझको मौन

कहाँ ले जाता मुझको मौन

सपन सोये हैं हो कर क्लान्त 
विकल मन ढूँढ रहा एकान्त
निशा में ठहरा मत्त समीर
मधुप उपवन के हैं दिग्भ्रान्त
     अभी मैं लौटा अपने ठाँव 
     कहाँ ले जाता मुझको मौन

खुले रजनी के श्यामल केश
पलक पट में आशा है शेष
सुमन का सोया है श्रृंगार
अतल के शोर हुए अवशेष
       अभी मैं आया अपने गाँव
       कहाँ ले जाता मुझको मौन

नील नलिनी के बन्द कपाट
गा चुके विरुदावली भी भाट
स्वाँति के उमड़े जलद सघन 
निगलता जाता गगन विराट
        अभी हैं थके थके ये पाँव
        कहाँ ले जाता मुझको मौन

खड़े क्यों बने बिम्ब उस पार
सरित की मन्थर चलती धार
ललित लतिका के उठते दोल
पुहुप में सौरभ का अधिभार
          अभी उन्मन है अपनी नाव
          कहाँ ले जाता मुझको मौन

रामनारायण सोनी
२.१.२५

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