रास रमने की घड़ी है
ए पवन तुम बाँसुरी में
फिर बहो एक बार आओ
चिर चिरन्तन रागिनी के
फिर मधुर स्वर वे जगाओ
आँगने में इस कुटी के
आ, आज कान्हा फिर पधारे
घन गरजते निज स्वरों में
पग पैंजनी धर आ मयूरा
कण्ठ में मल्हार भर ले
छम छमा, कर नृत्य पूरा
इस सघन छाया-वटी में
आ, आज कान्हा फिर पधारे
झूम लो रे द्रुमदलों तुम
ए लता बन जा हिंडोला
हर बटोही बाट का है
सुध बिसारे पन्थ भूला
उत्सवी नियती नटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
मौन क्यों पाषाण गिरि के
थी छैले छबि तुमने निहारी
वह कामरी काँधे धरे था
यहँ, गोप संग नाचा बिहारी
नाच ले आजा लकुटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
ओ यमुन के तट चलो अब
कुंजरों तुम आ मिलो सब
उठ करो श्रृंगार गिरिवर
गोप, गोसुत फिर मिलें कब
साँवरे की लख लटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
आ, रे! पपीहे टेर कर ले
कोकिला मृदु तान भर ले
क्यों उदासी हो कदम्बों
हर दिशा उल्लास भर ले
रास रमने की घड़ी है
आ, आज कान्हा फिर पधारे
रामनारायण सोनी
३.१.२५
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