Monday, 20 January 2025

तुम्हार कैसा स्वप्नाकाश

तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

सुप्त अधरों की कलिका में
अचानक जागे क्यों स्पन्द
व्यथा का सूना था यह गाँव
थकित नयनों के पट थे बन्द
       हरिक आहट पर देती कान
       तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

हुए वे सौरभ सब दिग्भ्रान्त
ठगी ठिठकी है चपल पवन
चकित सा यह सूना संसार
उभरती हिय में तीव्र जलन
        विकल वीणा के विस्मित तार
        तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

नियति से नित नूतन संघर्ष
बरसते मेघों से अवसाद
हृदय की धीर धमनियों में
मचाते हैं अतिशय उन्माद
         बिछे इन पथ में पागल प्राण
         तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

प्राण के आकुल कितने प्राण
त्वरा के पग घुँघरू झनके
कपोलों पर तारक से बिन्दु
छलक कर नीरव में ढुलके
        जुन्हाई का टूटा अधिमान
        तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश

रामनारायण सोनी
२१.१.२५


No comments:

Post a Comment