तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
सुप्त अधरों की कलिका में
अचानक जागे क्यों स्पन्द
व्यथा का सूना था यह गाँव
थकित नयनों के पट थे बन्द
हरिक आहट पर देती कान
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
हुए वे सौरभ सब दिग्भ्रान्त
ठगी ठिठकी है चपल पवन
चकित सा यह सूना संसार
उभरती हिय में तीव्र जलन
विकल वीणा के विस्मित तार
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
नियति से नित नूतन संघर्ष
बरसते मेघों से अवसाद
हृदय की धीर धमनियों में
मचाते हैं अतिशय उन्माद
बिछे इन पथ में पागल प्राण
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
प्राण के आकुल कितने प्राण
त्वरा के पग घुँघरू झनके
कपोलों पर तारक से बिन्दु
छलक कर नीरव में ढुलके
जुन्हाई का टूटा अधिमान
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
रामनारायण सोनी
२१.१.२५
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