तुम हृदय की वेदना संचेतना
कोकिला की कूक सी प्रतिवेदना
स्वाँति के घन में धधकती प्यास ले
रट रहा फिर भी पपीहा अनमना
चिर पिपासा इन अधर की
बंदिनी हो कर खड़ी है
हैं लता के पाश में वह मौन तरुवर
खंजनों के नैन हों जैसी रुचिर
मेघना में तड़ित छबि का हास ले
वह कौमुदी के अंक में बंदी भ्रमर
चिर प्रतीक्षा प्रिय मिलन की
मानिनी मन में बड़ी है
यामिनी जो ज्योत्सना का पान करती
स्वाँस में प्रस्वाँस में अनुबन्ध करती
चिर विरह की आग चकवी सह रही
अस्त हो जा चाँद, केवल आस करती
चिर प्रभंजन इस जलन की
योगिनी हो कर खड़ी है
रामनारायण सोनी
२५.१२.२४
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