Wednesday, 25 December 2024

योगिनी हो कर खड़ी है

तुम हृदय की वेदना संचेतना
कोकिला की कूक सी प्रतिवेदना
स्वाँति के घन में धधकती प्यास ले
रट रहा फिर भी पपीहा अनमना
        चिर पिपासा इन अधर की
        बंदिनी हो कर खड़ी है

हैं लता के पाश में वह मौन तरुवर
खंजनों के नैन हों जैसी रुचिर
मेघना में तड़ित छबि का हास ले
वह कौमुदी के अंक में बंदी भ्रमर 
         चिर प्रतीक्षा प्रिय मिलन की
         मानिनी मन में बड़ी है

यामिनी जो ज्योत्सना का पान करती
स्वाँस में प्रस्वाँस में अनुबन्ध करती
चिर विरह की आग चकवी सह रही
अस्त हो जा चाँद, केवल आस करती
          चिर प्रभंजन इस जलन की 
          योगिनी हो कर खड़ी है

रामनारायण सोनी
२५.१२.२४

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