मिली ही कहाँ ?
आँख में आँख उलझी जहाँ थी वहाँ
सारी बिसरी थी सुधियाँ वहाँ की वहाँ
फिर न लौटे वे पल ही कभी आज तक
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
धड़कनों संग धड़कन धड़कती रही
मन के पावों की पायल खनकती रही
बस वो तुम थी वहाँ, और मैं था वहाँ
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
दीप जलता रहा देख कर यूँ हमें
पाँव पल के अचानक वहाँ थे थमे
होंश में होश को, होंश था ना वहाँ
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तब से दिल की न दर की कुण्डी बजी
कोई प्यार की ना ही महफिल सजी
आम पर मंजरी है, वो कोयल कहाँ
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
हैं वो लमहे जिगर में अभी जो धरे
हैं पलकों की कोरों में आँसू भरे
है सिवा तेरे कोई जँचा ही कहाँ ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
उम्र जाती रही आँख पथरा गई
आस बोझिल हुई, और गहरा गई
अब पता ही कहाँ, मैं कहाँ ? तुम कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
बरसों बरस बाद फिर तुम मिली
उत्सवी हो गई मन की हर इक गली
आज उतरे जमीं पे हैं दोनों जहाँ
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
अनगिनत प्रश्न अन्तर में तैरे मगर
दो जुड़े उन दृगों में वो संवाद गूँजे
ये तन थे यहाँ पर, वे मन थे कहाँ
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
तुम मिली तो सही, पर मिली ही कहाँ?
रामनारायण सोनी
१२.०४.२४
No comments:
Post a Comment