छोटी सी बड़ी जिन्दगी
गुलाब के फूल ने
एक दिन लिखी अपनी
एक छोटी सी बड़ी जिन्दगी
...तब जब मैं काँटों के बीच
उगा था एक नन्हीं सी कली बन कर
सेपल से ढँकी सुरक्षित थी वह
फिर यह घेरा हटा और
अपनी पंखुड़ियों के डैने फैलाये
मुस्का कर मैंने
सूरज से आँख मिलाई
यह थी मेरी उत्सवी तरुणाई
मेरे उदर में जुड़ गया था
खुशबुओं का अनोखा संसार
जी भर कर लुटायी मैंने
सौरभ और सौंदर्य
मैं हाजिर था
किसी देव प्रतिमा पर चढ़ने को
किसी रमणी के जूड़े में सजने को
किसी की सेज पर बिखरने को
किसी की अर्थी पर समर्पित होने को
या फिर नदी की धारा में
बिखेर कर अपनी पंखुड़ियों को
उसमें तिनके सा बहने को
देखो!
कब जिया जिन्दगी
मैं अपने लिये
मैं मुझे नही सही
तुम्हें जरूर याद आऊँगा।
रामनारायण सोनी
२०.६.२४
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