Thursday, 12 September 2024

नयन नीर से भरे भरे

नयन नीर से भरे भरे

ये नयन नीर से भरे भरे
करुणा की छाया शीश धरे
हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके
तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके

धोते निज का नित खारा पन
उस मग में चिर करते नर्तन
अब सहज नहीं है सह पाना 
कोरों से अंजन बह जाना

प्रिय मिलन विरह के कूलों की 
द्वन्द्वो में मूर्छित फूलों की
सौरभ पी भटका पवन कहीं 
अणु अणु ने अपनी व्यथा कही

ना प्रिय प्रवास से लौट सका
चिर पीर स्वयं की धो न सका
तम की छलनाएँ छलती हैं
अन्तर की ज्वाल उगलती है

उस दूर क्षितिज की सीमा के
उस पार निठुर सी गरिमा के
प्रियतम का न्यारा नगर वहाँ
चिर सजल नयन की पीर यहाँ

इनके जलप्लावन धुँधलाते
कोरों पर आकर थक जाते
मृदुहास छद्म सा नयनों में
चिर आस प्रीत की अयनों में

ये नयन नीर से भरे भरे
कब तक पीड़ा के घूँट भरे
या तो तुम ही अब आ जाओ
या अपने संग लिवा जाओ

रामनारायण सोनी
१३.०९.२४

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