बूँद से मोती बनना है
मैं एक बूँद ही तो हूँ
नहीं देखता मैं नदी होने का स्वप्न
नहीं चाहता समुन्दर का सा विस्तार
नहीं चाहता मैं उड़ना भी
बादल बन कर स्वच्छन्द आकाश में
शतदल के पत्तों पर बँधा बँधा मैं
हो तो सकता हूँ खूबसूरत
पर डरता हूँ सूरज की तपन से,
नहीं बुझाना चाहता प्यास पपीहे की
मैं बस सीप के गर्भ में पलना चाहता हूँ
जहाँ खो सकूँ अपनी विरलता
चाहता हूँ उसी सीपी के गर्भ में
मेरी साधना मौन की साधना हो जावे।
जब खुलें सीपी के अन्तर्पट
चाहता हूँ मैं मोती बन जाऊँ
रामनारायण सोनी
५.१.२४
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