हे उषे!
तुम तमस के गर्भ से हो सद्यजात सुलक्षणी
प्रति दिवस के प्रात में नवआलोक की प्रकर्षिणी
स्वर्णमय आकाश की तुम स्वामिनी हो मृण्मयी
सुप्त जग में हो उतरती ले चेतना उद्धर्षिणी।।
अंग में प्रत्यंग में है कान्ति अरुणिम लस रही
स्वर्ग से अपवर्ग तक मधुमत्तमा सी बह रही
हे उषे! भर दो प्रखर प्रज्ञान इस क्षिप्त मन में
तुम प्रणव के नाद का जयघोष ही तो कर रही
हे उषे! शुभ हो तुम्हारा आगमन जग के लिये
स्वामिनी ऋत की तुम्ही हम सोम इसमें ही पियें
है तुम्हारी सौम्य चितवन प्राण की आह्लादिनी
हों सुखी संसार यह जग, हों निरुज हम सब जियें
हैं सभी ये पंथ ज्योतित बस तेरे अधिमान ही से
है छलकती ज्योति प्रातः स्वर्णघट आधान ही से
तुम विदा होती हो तब फिर लौटने को कल सुबह
अब प्रकाशित जग रहेगा दिवस यह दिनमान ही से
धेनुएँ रक्तिम जुती हैं, है दौड़ता यह रथ तुम्हारा
रश्मियों ने रंग दिया है चित्रपट सा नभ हमारा
सब दिशाएँ, वीथियाँ सब, स्वर्ण की सी धूलि मय
वन्दना करती प्रकृति भी
है प्रकृति भी कर रही ले थाल ये अर्चन तुम्हारा
वेद ने 'दुहितर्दिवः' कह नाम पावन सा दिया है
सत्य, ऋत के पथ चली तप कठिन तुमने किया है
भेद कर भीषण तिमिर को ज्योति की ले कर पताका
ज्ञान जनगण मन में भर उपकार तुमने किया है
तुम उतरती द्युलोक से रोज इस प्यारे जगत में
तुम जगाती सुप्त से देवांश मानव में प्रगत में
तुम सुनाती हो अरुण के अश्व की पदचाप सुमधुर
जब उदय होता है रवि नित प्रात में इस जगत में
वैदिक ऋषि उषा से पूछता है कि 'हे सुन्दरि! तुम द्युलोक से चल कर यहाँ इतने नीचे उतर कर क्यों आती हो?' उषा प्रत्युत्तर देती है कि 'मैं यहाँ अमृतपुत्रों से मिलने के लिये आती हूँ। मैं उन पर आशीषों का समन्दर लुटाने के लिये आती हूँ। मैं धरती पर वैसा ही प्रकाश उगाने आती हूँ, जैसा कभी मैंने सुदूर अतीत में उगाया था।'
ऋग्वेद के पाँचवें मंडल के एक उषा सूक्त की पहली ऋचा को देखें। 'द्युतद्यामानं बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणप्सुं विभातीम्। देवीमुषसं स्वरावहन्तीं प्रति विप्रासो मतिभिर्जरन्ते।।'इस ऋचा का भाव देखिए। 'हे उषासुन्दरि ! देवलोक का स्वर्णिम प्रकाश लेकर तू पृथ्वी पर उतर। जन-जन की चेतना में सुप्त देवांशों को जागृत कर दे। सूर्य के जन्म का यह पर्व फिर द्वार पर खड़ा है। हे सुजाते! तेरी मधुर वाणी में दिव्य अश्वों के पदचाप ध्वनित हैं।' इस ऋचा में द्युलोक की सुकन्या से कितनी सुंदर प्रार्थना की गई है। ऋषि उषा से जन-जन में सुप्त देवांशों को जगाने के लिये निवेदन कर रहा है। यह सम्पूर्ण पृथ्वी सूर्य के जन्म का उत्सव मनाने की तैयारी कर रही है, और उषा की मधुर वाणी में दिव्य अश्वों की पदचाप सुनाई दे रही है।
वैदिक ऋषि उषा को कभी सुजाता कहता है, कभी विभावरी कहता है, कभी दिव्य तनया, और कभी स्वर्गकन्या। उसका स्वरूप कुछ ऐसा है कि वह वसुओं से भरे हुए रथ पर आरूढ है। उसकी वंदना में अग्नशिखाएँ ऊपर तक उठ रही हैं। उसके उपहारों से विश्व का प्रांगण भर गया है। उसके आलोक के महारास में देवपुत्र झूम रहे हैं। पृथ्वी पर आनंद का प्रसाद बँट रहा है। पवित्र अभीप्साएँ चारों दिशाओं में फैल रही हैं।
उषा हमें ऐश्वर्यों की महादेवी दिखाई देती हैं। वैदिक ऋषियों ने उषा का जो वर्णन किया है, उसके अनुसार वह सूरियों में वीरता के तेज का संचार कर देती है। उसकी धवल दीप्ति और उज्ज्वल यश ही हमें आनंद के विस्तार में ले चलता है। वह अमर प्रकाश की प्रेरणाएँ और उज्ज्वल ज्योति के पवित्र कण लेकर हमें जगाने के लिये दौड़ी चली आती है। उसके आने के साथ ही हमारा साहस फिर से जाग उठता है।
उषा केवल ज्योति की देवी या स्वर्गकन्या ही नहीं है, वह वैदिक ऋषियों की सबसे सुंदर कविता भी है। ऋषियों का उद्गाता मन जब भी सुरभारती के अनुग्रह से काव्यमय होता है, तो वह उषा के सौन्दर्य में अवगाहन करता हुआ मनोरम पदबंध रचने लगता है। उषा को निवेदित जितनी भी ऋचाएँ हैं, वे हमें उत्साह और उमंग से भर देती हैं। इन ऋचाओं में वह ऊर्जा है, जो हमें प्रकाश की तरंगों के सहारे-सहारे द्युलोक तक की सैर कराने में समर्थ है।
🍁मुरलीधर
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