ये विकल नयन
जो हृदय चाहता था कहना
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया
सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी
मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं की वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल
महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा
सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है
सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले
अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों के भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं
गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े
सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ
ना शीत निशा से बच पाई
रामनारायण सोनी
१२.१२.२४
संशोधित
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