विपुल वेदना
मैंने खारापन सोखा है,
तुमको मृदु जल सींचा है
अर्णव के अतुलित बल से
लड़ कर जीवन खींचा है
स्वर्ण धूलि नभ में बिखरी
सूरज का आतप सह सह कर
छाँह मिले शीतल तुमको
सहा सभी मैंने तप कर
मेरे सपने कुछ बोल गए
अन्तर में पीड़ा घोल गए
नीरव रजनी की पलकों में
क्यों विपुल वेदना घोल गए
तुम अदृश्य हो दृश्यमान
उतरे ले सस्मित महारास
मेघों के उड़ते चीरों पर
अंकित करते प्रिय प्रवास
वीणा के विह्वल तारों में
मधुरव के स्वर मौन पड़े
जीवन की इस कलिका में
कितने कितने प्रतिमान गढ़े
निर्वाणों के वे पथ अनन्त
काली रजनी की है अलकें
लुढ़क लुढ़क जाती मेरी
भारित है मन की पलकें
महाशून्य के पार क्षितिज
सीमा अवरेख हुई जाती
कोमल किसलय कलिकाएँ
ऐसे में कैसे मुस्क्याती?
श्यामल नीरद की छलनाएँ
गलित हृदय में कौंध रही
इन अरुण नयन में अश्रु भरे
देखो तुमको ही खोज रही
रामनारायण सोनी
२७.७.२४
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