Saturday, 3 August 2024

प्यास अधरों पर धरूँगा

प्यास अधरों पर

स्वाँस के मृदु तन्तु टूटे
भाव के सब बन्ध टूटे
रट रहा फिर भी पपीहा
स्वॉंति के अनुबन्ध खूटे
जुगनुओं से रोशनी की अर्चना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

पुष्प हैं निस्पन्द सारे
मौन क्यूँ हैं सब दिशाएँ
भीत मन के द्वार आ कर
कँप रही हैं क्यूँ शिराएँ
नेह के इस मेघ से जल-याचना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

सूखती सी वर्तिका ले
दीप क्या यह जल सकेगा
क्या सुलगती सीपियों में
आस का मोती पलेगा
हो मलय मधुवात मन में प्रार्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

हैं प्रबल लहरें उदधि की
और तरणी क्षीण सी है
रौंदती मन को व्यथाएँ
चेतना कुछ लीन सी है
प्राण की वंशी बजे यह अभ्यर्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

रामनारायण सोनी
३.८.२४

No comments:

Post a Comment