"स्वप्नों के आलिंगन में"
"हम सृष्टि का बाह्य और आन्तरिक सौंदर्य अनुभव करें!"
समस्त सृष्टि की जड़ और चेतन में परमात्म-सत्ता की चेतना विद्यमान है लेकिन यदि हमारी दृष्टि उसके स्थूल स्वरूप तक सीमित रहेगी तो उसमें निहित सूक्ष्म संवेदना के भाव तिरोहित नहीं हो सकते। वस्तुतः यदि प्रकृति में परमात्मा की और परमात्मा का प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त होना हमें परिलक्षित हो सके तो ही हम उसकी समग्रता और परिपूर्णता का अनुभव कर सकते हैं। इसी तरह के भाव जब जब मेरे मन में सघन हुए तब तब मुझे प्रकृति के उस बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उसमें परम सत्ता की चेतना का आभास हुआ। मुझे उसके इस नैसर्गिक सृजन में उसी का सहज रूप प्रतिबिम्बित हुआ सा लगा। हमारी दृष्टि प्रकृति का जो स्वरूप स्पष्ट रूप में देखती है उसे ही वह सत्य मान लेती है लेकिन उसके स्थूल स्वरूप से परे देखना एक प्रकार का स्वप्न ही है। इसके बावजूद मैं शायद इस तरह के स्वप्न के आलिंगन में पड़ गया और कुछ अकिंचन सी कविताएँ मेरे मानस पर उतरी वे यहाँ संग्रहित है।
इन रचनाओं में पाठकों को संभवतः कहीं-कहीं रूढ़ियों और नियमबद्धता का अतिक्रमण हुआ लगेगा लेकिन ये रचनाएँ अत्यन्त सहजता में सामान्य रूप में आरेखित हुई है। इनमें नारी का विशुद्ध प्रेयसी के स्वरूप में ही उसकी पावनता के साथ उसके नैसर्गिक स्वरूप और लालित्य को ग्रहण किया है। मैं मानता हूँ कि नारी और प्रकृति केवल भौतिक सौंदर्य की स्वामिनी ही नहीं है वरन उसकी संचेतना अलौकिक आनन्द का स्रोत है जो केवल अनुभूति का विषय है।
मुझे महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की कृति 'स्वर्णधूलि' की रचना 'स्वप्न बंधन' की ये पंक्तियाँ याद आती है जो मेरी इस सम्पूर्ण कृति के भावपक्ष में रंजित है। इसीलिये प्रस्तुत कृति का नामकरण भी इसी से उद्भूत है।
"बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में
एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में!
बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में!"
आशा करता हूँ कि कृति को सुधि पाठकों का स्नेहाशीष कृति को अवश्य मिलेगा।
रामनारायण सोनी
४.७.२४
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