मन में वसन्त फिर आएँगी
अन्तर के असीम अंचल में
स्मृति के अगणित प्रस्तर में
छवि के अभिलेख लिखे ऐसे
शैलों में तन - चित्र गुदे ऐसे
क्या अमिट रेख मिट पाएँगी
क्या काल अग्नि दह पाएँगी
झर जाते तरु के पीत पात
वय - कुठार ने किये घात
कुन्दन कितना ही तपे गले
साँचे में नव - नव रूप ढले
क्या शाख निरंकुर रह पाएगी
सह कर भी क्या सह पाएगी?
नभ में कितनी उल्का फैली
धरणी ने आहत हो झेली
पतझार विहरते उपवन में
फिर भी हैं बास सुमन में
क्या शिशिर सदा रह पाएगी
मन में वसन्त फिर आएँगी
रामनारायण सोनी
१५.३.२५
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