Saturday, 15 March 2025

बहारें फिर आएँगी

मन में वसन्त फिर आएँगी

अन्तर के असीम अंचल में
स्मृति के अगणित प्रस्तर में
छवि के अभिलेख लिखे ऐसे
शैलों में तन - चित्र गुदे ऐसे
     क्या अमिट रेख मिट पाएँगी
     क्या काल अग्नि दह पाएँगी

झर जाते तरु के पीत पात
वय - कुठार ने किये घात
कुन्दन कितना ही तपे गले
साँचे में नव - नव रूप ढले
      क्या शाख निरंकुर रह पाएगी
      सह कर भी क्या सह पाएगी?

नभ में कितनी उल्का फैली
धरणी ने आहत हो झेली
पतझार विहरते उपवन में
फिर भी हैं बास सुमन में
      क्या शिशिर सदा रह पाएगी
      मन में वसन्त फिर आएँगी

      रामनारायण सोनी
      १५.३.२५

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