Wednesday, 5 March 2025

दीप मैं अविचल अकम्पित

दीप मैं अविचल अकम्पित


अंधकार पी पी कर भी तो 

मैं ना हारा ना थका कभी

जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी

मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी

जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ


कुटिया और महलों दोनों में 

भेद कभी भी नहीं किया

मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया

सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया

सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ


जलती ज्वाला शीष धरे 

अभिसिञ्चन उसका करता हूँ

अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ

चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ

शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।

मैं अपना धर्म निभाता हूँ 

हर युग में पूजा जाता हूँ



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