दीप मैं अविचल अकम्पित
अंधकार पी पी कर भी तो
मैं ना हारा ना थका कभी
जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी
मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी
जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
कुटिया और महलों दोनों में
भेद कभी भी नहीं किया
मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया
सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया
सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
जलती ज्वाला शीष धरे
अभिसिञ्चन उसका करता हूँ
अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ
चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ
शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
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